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अर्जुन सनी देओल के करियर को संवारने वाली फिल्म

राहुल रवैल और जावेद अख्तर मुंबई के पास लोनावाला हिल स्टेशन पर गए हुए थे. जावेद ने एक दिन तड़के 4 बजे सोते हुए राहुल को उठाया. वह गहरी नींद में थे लेकिन जावेद ने कहा कि मेरे दिमाग में फिल्म बनाने का एक कमाल का आइडिया आया है|


सनी देओल के फिल्मी करियर को ऊंचाई पर पहुंचाने में ‘अर्जुन’ का बड़ा हाथ है. 10 मई 1985 में रिलीज हुई इस फिल्म की कहानी एक ऐस युवा की है जो क्राइम, करप्शन, अन्याय के बीच अपने एजुकेशन, करियर और फैमिली लाइफ को लेकर जद्दोजहद करता है और विद्रोह कर बैठता है. राहुल रवैल (Rahul Rawail) के निर्देशन में बनी इस फिल्म की कहानी युवाओं को खूब पसंद आई थी. इस फिल्म में संगीत आर डी बर्मन ने दिया था. इस फिल्म को बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट स्टोरी का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था. इस फिल्म की स्टोरी लिखने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है|


साल 1982 में दिलीप कुमार-अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘शक्ति’ आई थी. उसके बाद सलीम-जावेद की जोड़ी ने अलग होने का फैसला कर लिया. जावेद अख्तर ने एक दिन सलीम खान से कहा कि अलग काम करना चाहता हूं. जावेद उन्हें दरवाज़े तक छोड़ने आए. ये वही रात थी जब सलीम ने कड़वाहट के साथ कहा था, “अभी इतना बूढ़ा नहीं हुआ कि अकेले न चल सकूं”. खैर इन दोनों राइटर्स की जोड़ी भले ही अलग-अलग काम करने लगी. लेकिन इन्होंने साथ मिलकर जो रचा वो कहीं गायब नहीं होने वाला था. इनकी रचनाओं में से सबसे पॉपुलर था – द एंग्री यंग मैन. अस्सी के दशक में अमिताभ वो इंटेंस, गुस्सैल लड़के नहीं रहे जिसके जिगर में सदा एक आग दहकती थी|


इस दशक को अपना नया ‘विजय’ मिलने वाला था. ‘अर्जुन’ के रूप में. साल 1985 में ये फिल्म रिलीज़ हुई. लिखा था जावेद अख्तर ने. देखते वक्त आपको अर्जुन में ‘दीवार’ के दोनों भाई मिलेंगे. पढ़ा-लिखा है, नौकरी चाहिए. पढ़ाई के कागज़ पूरे हैं, बस उनके बीच दबा रेफ्रेंस का पर्चा नहीं. दूसरी ओर उसे उसके पिता ने निराश किया है. वो पिता. जो ज़रूरत पड़ने पर आगे नहीं आते. सच बोलने की हिम्मत नहीं रख पाते. उन नेताओं ने उसके साथ बुरा किया, जिन्होंने कभी राष्ट्र-निर्माण के सपने दिखलाए थे. अर्जुन मालवनकर इन दोनों दिशाओं का संगम था. ‘अर्जुन’ ऐसे समाज और ऐसी व्यवस्था का रूपक था|


सनी देओल और राहुल रवैल ने बतौर अभिनेता और निर्देशक कई फिल्में साथ की हैं। जिसमें से एक बेहतरीन फिल्म है 'अर्जुन' जो 1985 में रिलीज हुई थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल हुई थी, बाद में इसे खूब देखा और सराहा गया। यहां तक कि इस मूवी के तमिल, तेलुगु और कन्नड़ संस्करण भी बने। फिल्म तकनीकी रूप से भी खासी मजबूत थी। कई दृश्य इतने उम्दार तरीके से फिल्माए गए कि इनकी खूब चर्चा हुई। मणिरत्नम जैसे निर्देशक ने भी इन दृश्यों के फिल्मांकन को सराहा।


अर्जुन को जावेद अख्तर ने लिखा था और फिल्म के हीरो में में एंग्री यंग मैन वाला अवतार नजर आता है जो उन्होंने सलीम के साथ मिलकर अमिताभ बच्चन की फिल्मों के लिए लिखा था। सत्तर के दशक का एंग्री यंग मैन सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा था और इसे अस्सी के मध्य में नए कलेवर के साथ जावेद ने फिर दोहराया।


अर्जुन का अर्जुन, यानी सनी देओल द्वारा अभिनीत किरदार भी समाज में फैले भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से परेशान है। युवा है, डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं है। हर जगह झिड़की सुननी पड़ती है चाहे घर हो या बाहर। उसके जैसे निठल्ले लड़के दिन भर समय काटने के लिए चाय की दुकानों पर बैठे रहते हैं। सभी कुंठित हैं, गुस्सा हैं क्योंकि भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शोषण के चलते वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

अर्जुन अपनी सौतेली मां के तानों से भी परेशान है। अपने बूढ़े पिता का नौकरी करना भी उसे रास नहीं आता क्योंकि मालिक खूब डांटता रहता है, लेकिन वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता।


अर्जुन अनजाने में स्थानीय गैंगस्टरों के साथ उलझ जाता है जो स्थानीय सांसद से जुड़े होते हैं। दूसरा प्रतिद्वंद्वी राजनेता इस मामले में अर्जुन की मदद करता है। जल्दी ही अर्जुन और उसके दोस्त राजनीति के गंदगी से वाकिफ हो जाते हैं जब उन्हें पता चलता है कि उन्हें राजनेताओं द्वारा अपने स्वार्थ के लिए मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।


जावेद अख्तर की कहानी दमदार है। आम होते हुए भी यह खास लगती है। अर्जुन जब आक्रोश से खड़ा होता है तो दर्शकों की मुठ्ठियां भी तन जाती है। जावेद की कहानी को राहुल रैवल का कसा निर्देशन और बाबा आजमी की सिनेमाटोग्राफी गहराई देती है।


अर्जुन’ को बनाया था राहुल रवैल ने. यही वो फिल्म थी, जिसने सनी देओल को एक्शन हीरो बनाया. ऐसा एक्शन हीरो, जिसे आंतरिक हिंसा दर्शाने के लिए चीखने-चिल्लाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. ‘अर्जुन’ वो फिल्म थी, जिसके बाद रीमेक्स की बाढ़ आ गई. आज भी हिंदी फिल्मों में इसकी छाप देखी जा सकती है|

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