
बनारस की गलियों की रोचकि प्रेम कहानी रांझणा को रिलीज हुए दस साल पूरे हो गए हैं। शायद पिछले दस सालो में रांझणा उन गिनी चुनी फिल्मों में है जिसे कई लोगों ने दो से तीन बार देखा होगा। रांझणा फिल्म की पटकथा इस फिल्म को अलग लेवल पर लेकर जाती है।
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फिल्म का नाम और फिल्म का आइडिया
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फिल्म का नाम रांझणा रखा गया था जो हीर रांझे की लोकगाथा के किरदार रांझा का नाम है। रांझा की कहानी क्या है इससे जरूरीचीज ये है की रांझा प्रेम की किस भावना का प्रतीक है। रांझा होने का मतलब है किसी एक चीज के किनारे किनारे किनारे अपनी दुनियाबना लेना। रांझा को मतलब नही है कि सामने वाला हीर है भी या नहीं, उसे बस इस बात से फर्क पड़ता है कि वो किसी को एक बारदेखकर रांझा हो गया।और हिमांशु शर्मा ने अपनी इस फिल्म में पांच किरदार रांझा जैसे लिखे थे जिसमे पहला रांझा था कुंदन।
कुंदन जब पहली बार जोया को देखता है तो रुक जाता है ठहर जाता है। और फिर कुंदन उस जगह से कभी गया ही नहीं,पूरी जिंदगीकुंदन को यही लगता रहा कि सामने जोया नमाज पढ़ रही है और वो उसे देख रहा है। कुंदन जोया को पाने से पहले उसे मनाने के लिएजतन करता है, आज के समाज को कुंदन के कुछ तरीके प्रोब्लेमेटिक लग सकते है पर सिनेमा में ऑथेंसिटी भी कुछ चीज होती है। कुंदनहर वो जतन करता है जिससे उसे लगता हु कि जोया मान जायेगी। जोया के हाथ से थप्पड़ खाता है, जोया के गली के लड़को से झगड़ाकरता है, मुरारी के ताने सुनता है, बाप की गाली सुनता है और यहां तक सब जानते बूझते हुए भी बिंदिया का दिल तोड़ता रहता है।तमाम जतन करते करते आखिरकार जोया मान जाती है, पर वक्त अपना खेल खेलता है, जोया पढ़ाई के लिए बाहर जा रही है कुंदन कोपता चलता है तो वो प्लेटफार्म पर भागता है जोया के पीछे? क्यू भाग रहा है? रोक लेगा जोया को? साथ चला जायेगा उसके? नही, बसवो भाग रहा है क्युकी वो रांझा है। प्लेटफार्म पर गिरते पड़ते वो वादा करता है जोया से की वो इंतजार करेगा उसका, बिना ये जाने समझेकि क्या जोया चाहती है कि वो इंतजार करे?
फिल्म का दूसरा रांझा है मुरारी, कुंदन का दोस्त। दोस्त भी ऐसा जिसे शुरू से पता है कि ये जोया नाम की लड़की कुंदन को कही कानही छोड़ेगी। पर जहा भी छोड़ेगी, जिस हाल में छोड़ेगी मुरारी साथ रहेगा कुंदन के। कुंदन जहां एक तरफ जोया के लिए अपनी मुहब्बतनिभा रहा है तो मुरारी अपनी दोस्ती। उसी तरह से, सब जानते हुए कि आगे क्या होगा। वो हर वक्त समझाता रहता है कि यार ये लड़कीतेरे लिए सही नही है, वो कुंदन को ताने मारता है, उसकी खिल्ली उड़ाता है, उसे समझाने की कोशिश करता है कि "गली मुहल्ले के लौंडोका प्यार अक्सर शहर के डॉक्टर इंजीनियर उठा कर ले जाते है।" पर जब कुंदन कहता है चल तो साथ चल देता है। आखिर के कुंदनउसे छोड़ कर जोया के पीछे चला जाता है पर मुरारी को तब भी इंतजार है अपने दोस्त का, कि वो कितना भी टूट कर वापस आएगा उसेवो संभाल लेगा।
फिल्म का तीसरा रांझा है बिंदिया।वो जो किसी और दुनिया में होती तो शायद जोया को पसंद करती पर उसे अभी चिढ़ होती है जोयासे। वो जोया जो कुंदन के ऊपर जादू की तरह हावी है और बिंदिया के सारे जतन सारी मेहनत भी कुंदन को जोया के चंगुल से छुड़ा नहीसकती। बिंदिया को इस बात का दुख है कि कुंदन उसे प्यार नही करता, पर इस बात का ज्यादा दुख है कि जोया ने क्या हालत कर दीहै कुंदन की। बिंदिया का बस चलता तो वो कोई दुख आने देती कुंदन के सर पर? लेकिन उसे भी मालूम है कि प्यार कितना बेवकूफीभरा काम है, वो खुद कर रही थी। कुंदन ने उसको जो कहा जब कहा उसने सब किया, बिंदिया वो करने को भी राजी थी जिसके लिएकुंदन राजी नहीं था। वो एक तरफ इस कोशिश में रहती कि जोया दूर हो जाए, तो दूसरी तरफ हर वो काम करती जो कुंदन की जोयाको पाने की कोशिशों का हिस्सा होता। बिंदिया को मालूम है कि वो कुंदन को फल खिला रही है पर कुंदन खून बहा रहा है जोया केलिए? पर क्या बिंदिया कुंदन को कभी फल के लिए मना करेगी? नही, एक वक्त के बाद बिंदिया कुंदन के पागलपन को कबूल कर लेतीहै और इस बात में खुश हो जाती है कि वो बस विटामिन खाता रहे, आशिकी भले किसी से लड़ाए।
फिल्म का चौथा रांझा है अकरम। जो एक अच्छे घर का लड़का है। लोगो के बीच पॉपुलर है, इज्जत रुतबा पैसा सब है। फिर उसे जोयामिलती है, और उसे कुंदन बना देती है। ऐसा कुंदन जिसके पास न मुरारी है, न बिंदिया है, और न ही बनारस। उसके पास सिर्फ जोया है।जोया कहती है तो वो नाम धरम परिवार सब छोड़ कर बनारस चला आता है।कोई दो चार सवाल न पूछ ले अचानक से इसलिए वोअजान और आयते रट कर आया है। पर शादी से पहले उसके बीच कुंदन आ जाता है। कुंदन उससे वो सवाल पूछता है जो वो रट करआया था, कोई और पूछता तो शायद वो जवाब देता भी, पर वो कुंदन के सामने कैसे साबित करे कि उसके लिए जोया क्या है उसकेलिए। इसलिए अकरम चुप रहता है, वो जनता था कि कुंदन के सालो के इंतजार के बाद वक्त ने कुंदन को एक मौका दिया है। अकरमखामोशी ओढ़ कर मर जाता है। मरने से पहले वो कुंदन के कान में बताकर जाता है कि वो भी रांझा है, बस दूसरी दुनिया का।
अकरम की मौत के बाद कुंदन उस जगह खड़ा है जहां पर वो अपनी मुहब्बत पर सवाल उठा रहा है। वो क्यू कबूल नहीं कर पाया अकरमको, जैसे बिंदिया ने जोया को किया।
जैसे मुरारी ने सब जानते हुए भी कुंदन का हर कोशिश में साथ दिया। आखिर कैसे वो उस इंसान की खुशी के बीच में आ गया जिसइंसान की खुशी से बढ़कर उसके लिए कुछ नही था। वो अब जोया को मनाने की कोशिश करता है पर उसे मालूम है कि वो माफी केकाबिल नही है। पर वो रांझा है, एक और इंतजार की हिम्मत अब उसमे बची नही है, जोया को अब उससे नफरत है। पर ये नफरत हीअब उसकी जिंदगी है। उसे अब जोया नही चाहिए, उसे अब माफी भी नही चाहिए, बस वो पास रहना चाहता है। वो जोया को दिखानाचाहता है कि रांझा होना क्या है। उसे मालूम है कि वो मौत की तरफ बढ़ रहा है, पर इसी में उसकी मुक्ति है, ये मुक्ति उसे बनारस में नहीमिल सकती, क्युकी वहा जोया नही है, जहा जोया है वही बनारस है उसके लिए। उसे मालूम है कि जो उसने अनजाने में अकरम के साथकिया, जोया जान बूझ कर उसके साथ वही करने वाली है। पर यही उसकी नियति थी, जोया के साथ जीना नही, जोया के लिए मरजाना। नमाज में जोया को देखने के बाद वो हर कदम इसी मौत की तरफ बढ़ता जा रहा था, उसे बिंदिया ने रोका, उसे मुरारी नेसमझाया, वो खुद भी जानता था, पर राँझे को हीर मिले न मिले, रांझा हीर में मिल जाए ये जरूरी है। वो रांझा जिसे फर्क नही पड़ता किक्या होगा, क्या छिन जाएगा, क्या टूट जायेगा क्या बिखर जाएगा, रास्ता पत्थर का हो, फूलो का हो, आग का हो या गहरा समंदर, अगरवो रास्ता जोया तक न सही, जोया के करीब भी जाता है तो वो चलता जायेगा।
मौत की गोद में सर रखे कुंदन को एहसास है कि जोया कहेगी नही, पर उसे प्यार हो चुका है कुंदन से, जोया आंख में आंसू लिए सर परहाथ फेर रही है उसके, पता नही ऐसी मौत दुबारा मिले न मिले उसको,इसलिए मर जाना ही सही है क्योंकी, यही तक कि तो लड़ाई थीकुंदन की, यही तक का जतन था कुंदन का। अब तो सब पा लिया है उसने, इसलिए अब साला उठे कौन, कौन फिर से मेहनत करे।