
कागज़ एक किसान की वास्तविक जीवन (भारत लाल बिहारी) की कहानी पर आधारित है जिसको सरकारी कागज़ मैं मृत घोषित कर दिया गया हैं। अब उस व्यक्ति को अपने आप को कागज़ मैं जिंदा प्रमाणित करना हैं और उसके लिए वो कानून का सहारा लेता हैं।

कहानी के अनुसार, भरत लाल (पंकज त्रिपाठी) के चाचा-चाची उसे मरा हुआ घोषित करवाकर उसकी जमीन हड़प चुके हैं।
भरत लाल कागज पर जिंदा होने के लिए लेखपाल से लेकर कोर्ट-कचहरी तक चक्कर लगाता है, लेकिन काम बनते न देख वह तरह-तरह की तरकीब लगाकर सरकार तक अपनी बात पहुंचाता है। हर बार उसे ही मुंह की खानी पड़ती है। उसके इस संघर्ष-भरे सफर में उसकी पत्नी, प्रेस रिपोर्टर, विधायक (मीता वशिष्ठ) और उसके जैसे पीड़ित तमाम लोग मृतक संघ बनाकर उसका साथ देते हैं।

हमारे देश मैं एक सिस्टम हैं और उस सिस्टम का एक हिस्सा है प्रशासन। प्रशासन तय करता हैं कौन व्यक्ति क्या हैं? मतलब जाति, धर्म, परिवार सब प्रशासन ही तय करता हैं और आपको मिलता उसका प्रमाण पत्र मतलब एक कागज़। बस उसी कागज़ की लड़ाई चल रही हैं।
एक व्यक्ति जीता जागता खड़ा हैं लेकिन कागज़ कहते हैं व्यक्ति मर चुका है और प्रशासन मानेगा भी कागज़ की।
फिल्म मैं पकज त्रिपाठी का एक संवाद हैं - "आप कागज़ की सुनेंगे इंसान की सुनेंगे....दिल इंसान की सीने में धड़क रहा है कि कागज़ में धड़क रहा है बाल बच्चा मेहरारू...कागज़ के होते है कि इंसान की होत है"

फिल्म हमारे सिस्टम पर एक प्रहार हैं और व्यंगतमक तरीके से अपनी बात कहती हैं , सतीश कौशिक की बात करें तो निर्देशन भी उनका रहा और एक्टिंग भी की है. एक्टिंग के मामले में तो सतीश कौशिक को पूरे नंबर देने पड़ेंगे वहीं उनका निर्देशन भी अच्छा कहा जा सकता है।