top of page

ऑन स्क्रीन कभी साथ नहीं दिखे फ़िल्मी दुनिया के ये दो मशहूर सितारे

दिलीप कुमार साहब पक्के परफेक्शनिस्ट थे। उन्हें एक-दो रिटेक में न आनंद मिलता और न ही संतोष। रिटेक पर रिटेक होता रहता।


डायरेक्टर परेशान हो जाते - युसूफ साब आपने बिलकुल परफेक्ट टेक दिया है। इसमें आगे सुधार की कतई गुंजाईश नहीं है।


मगर युसूफ साब इतनी आसानी से मानने वालों में कहां - नहीं भाई थोड़ी गुंजाईश है। मैं जानता हूं कि मैं इससे बेहतर कर सकता हूं।


आख़िरकार होता ये था कि 36-37 रिटेक हो जाते और युसूफ भाई भी थोड़ा थक जाते - ठीक है अब ज़रा प्रीव्यू हो जाए।

प्रीव्यू देखा गया। युसूफ साब ने थोड़ा सर खुजाया - अरे भाई ये पहला वाला टेक तो सबसे बेहतर है। इसी को फाइनल करो।

कुल नतीजा ये होता था कि छह महीने में तैयार होने वाली फिल्म दो-तीन साल में बन पाती थी। फ़िल्म का बजट भी बढ़ जाता था।


कुछ ऐसे ही थे काका उर्फ़ राजेश खन्ना। खासतौर पर तब जब अमरदीप (1979) से वो एक नए अवतार में दिखे। उनके कैरियर में परफॉरमेंस के नज़रिये से ये एक शानदार फिल्म थी और साथ ही बॉक्स ऑफिस पर सफलता की वापसी भी।

युसूफ साब अपनी धरोहर राजेश खन्ना में ही देखते थे। दोनों पक्के स्टाइलिश और परफेक्शनिस्ट।


फ़िल्मी जानकारों की माने तो दिलीप कुमार और राजेश खन्ना में पटरी भी बहुत खाती थी। अक्सर जाम के साथ लंबे डिस्कशन भी चलते थे।


लेकिन ये जानकर आपको आश्चर्य होगा कि अदाकारी की दुनिया में 'मील के पत्थर' इन दो लीजेंड को एक-साथ लाने की शायद कोशिश ही नहीं की गई।


दिलीप कुमार-राजकपूर (अंदाज़), दिलीप कुमार-देवानंद (इंसानियत), दिलीप कुमार-संजीव कुमार (संघर्ष, विधाता), दिलीप कुमार-अमिताभ बच्चन (शक्ति), दिलीप कुमार-शम्मी कपूर (विधाता), दिलीप कुमार-नसीरुद्दीन शाह (कर्मा) और दिलीप कुमार-राजकुमार (पैगाम, सौदागर) जब एक साथ आये तो अदाकारी की दुनिया में एक नए गुल खिले। परफॉरमेंस की शौकीनों के कलेजों पर ठंड पढ़ी और एक्टिंग सीखने वालों को भी मदद मिली।


अगर ये दो लीजेंड आमने-सामने खड़े हुए होते तो अदाकारी की दुनिया यकीनन पूरी तरह गुलज़ार हो गई होती और एक्टिंग की यूनिवर्सिटी का आखिरी चैप्टर भी यही होता।

 FOLLOW US

  • Facebook
  • Instagram
  • LinkedIn
  • Pinterest
  • Twitter
  • YouTube
bottom of page