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पर्यावरण के नुकसान की भरपाई नहीं

नई दिल्ली| सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) सरसों की व्यावसायिक खेती पर यथास्थिति बनाए रखने का वादा करते हुए पिछले साल नवंबर में अदालत में दी गई मौखिक टिप्पणी को वापस लेने की केंद्र की याचिका पर सुनवाई को टाल दिया। यह वादा जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष दिया गया था, जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। केंद्र सरकार की हालिया अर्जी पर 26 सितंबर को सुनवाई होगी। इस दौरान शीर्ष कोर्ट ने कहा कि इससे पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी केंद्र की उस याचिका पर की, जिसमें कहा गया था कि या तो इसे नवंबर, 2022 के मौखिक उपक्रम से मुक्त कर दिया जाए या वैकल्पिक रूप से सरकार को इस सीजन में कुछ साइटों पर जीएम बीज बोने की अनुमति दी जाए। दरअसल केंद्र ने जीएम सरसों की व्यावसायिक खेती पर यथास्थिति बनाए रखने के लिए नवंबर, 2022 में दिए गए ’मौखिक शपथ’ को वापस लेने के लिए एक आवेदन दायर किया है।


मौखिक शपथ जस्टिस दिनेश माहेश्वरी (अब सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष दिया गया था। केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने मंगलवार को पीठ के समक्ष दलील दी कि वह शपथ एक अलग संदर्भ में किया गया था और यह एक पर्यावरणीय रिलीज है जहां 12 वर्षों तक शोध चला है। उन्होंने आगामी बुआई सीजन और खाद्य तेल की बढ़ती मांग पर प्रकाश डाला। ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि अगर अदालत हमें हमारे उपक्रम से मुक्त कर देती है, तो हम शुरू में प्रस्तावित दस स्थलों पर सरसों के बीज बोने और अनुसंधान करने के लिए आगे बढ़ सकते हैं। इस पर पीठ ने उनसे पूछा कि अगर हम आपको डिस्चार्ज कर दें तो इस मामले में क्या बचता है।

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