
नीमच ।(सतीश सैन) शुक्रवार को जावद स्थित अग्रसेन भवन परिसर में कांग्रेस जिलाध्यक्ष अनिल चोरसिया के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वयं समन्दर पटेल ने इस बात की घोषणा की वे कांग्रेस में शामिल हो गए और 18 तारीख को भोपाल में कमलनाथ से मिलकर औपचारिक तौर पर अपने समर्थकों के साथ जाकर सदस्यता ग्रहण करेंगे।
पिछले दिनों मनासा में मुख्यमंत्री के रोड़ शो और सभा से जिले के चुनावी माहोल में आंच लगी थी की अब क्षेत्र के बड़े सिंधिया समर्थक माने जाने वाले भाजपाई नेता समंदर पटेल के एक निर्णय ने जिले की राजनीति को और गरमा दिया है।
सिर्फ कॉंग्रेस की सदस्यता लेने के लिए भाजपा और सिंधिया को छोड़ने का बड़ा निर्णय मुमकीन नहीं !
निर्णय हो चुका है और वे अगले कूछ दिनों में प्रदेश कॉंग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ से मिल कर ओपचारिक रूप से कांग्रेस में वापसी करेंगे। समंदर पटेल ने भाजपा छोड़ने की वजह का सारा ठिकरा अपनी विधानसभा जावद के विधायक व मंत्री ओम प्रकाश सखलेचा पर फोड़ा है । अब सखलेचा से आहत समंदर पटेल ने तो कॉंग्रेस के रूप में विकल्प तलाश ही लिया है लेकिन भाजपा छोड़ कर सखलेचा विरोधियों के साथ-साथ स्वयं के रूप में कॉंग्रेस को भी एक विकल्प सौंप दिया है। ऐसा इसलिए क्योंकी कमलनाथ जी से उनकी चर्चा हो चुकी है और सखलेचा से आहत मन को सिर्फ कॉंग्रेस की सदस्यता भर से संतोष हो जाए यह मुमकिन नहीं । यह भी तार्किक नहीं लगता की सिर्फ सखलेचा से आहत हो कर अपने आयडियल और आका सिंधिया महाराज के साथ-साथ भाजपा को भी छोड़ दिया जाए । मतलब साफ है की मंत्री ओम प्रकाश सखलेचा का सामना करने के लिए एन चुनाव के पहले प्रतिबद्धता की कसमें खिलाने के बाद कॉंग्रेस नेता राजकुमार अहीर और सत्यनारायण पाटीदार का विकल्प तलाश रहे प्रदेश कॉंग्रेस नेतृत्व ने समंदर पटेल के रूप में जावद का उम्मीदवार खोज लिया है और उम्मीदवारी के करार के बगैर यदि पटेल कॉंग्रेस में जा रहे हैं तो उनकी इस कदमताल का कोई औचित्य नहीं होगा।
सिंधिया समर्थक पटेल के भाजपा छोड़ जाने से प्रदेश के अंतिम छोर पर नीमच जिले की राजनीती और यहाँ की तीनों विधानसभा सीटों पर इसका काफी असर होगा ऐसा प्रतीत होता है। जावद के लिहाज से फिलहाल भले मंत्री सखलेचा, उनके समर्थक या भाजपाई यह मान कर संतुष्ट हों की पटेल के जाने से एक दावेदार कम हुआ और उनका सरदर्द खत्म हुआ लेकिन इस बात की संभावना ज्यादा है की पटेल के जाने से कॉंग्रेस मजबूत होगी और यह उसके हित में होगा।
इधर पिछले तीन दिनों से पटेल की कॉंग्रेस में आमद पर प्रतिक्रियाओं को देखें तो भी यह झलकता है । जावद से कॉंग्रेस के प्रबल उम्मीदवार राजकुमार अहीर और उनके समर्थकों ने दबी जबान से ही सही समंदर पटेल का कॉंग्रेस में स्वागत किया है । अहीर भी जानते हैं की उनके विधायक बनने के बजाए कमलनाथ का मुख्यमंत्री बनना ज्यादा जरुरी है। वहीं जावद से अपनी उम्मीदवारी को तय मान कर चल रहे सत्यनारायण पाटीदार व उनके समर्थक इस खबर से अहीर के मुकाबले ज्यादा आक्रोशित और मुखर हैं। उनके समर्थक सोशल मीडिया पर कॉंग्रेस में शामिल होते पटेल को गद्दार कह कर संबोधित कर रहे हैं । हालांकी जिस दिन कमलनाथ, कॉंग्रेस में शामिल हों रहे पटेल को दुपट्टा उड़ाएंगे उस वक्त का सीन शायद कुछ अलग होगा।
प्रतिबद्धता पर तो समंदर, राजकुमार और सत्तू तीनों ही खरे नहीं उतरे
जहां तक प्रतिबद्धता की बात है तो समंदर पटेल और राजकुमार अहीर की तरह भले ही सत्तू पाटीदार ने कॉंग्रेस से बगावत कर निर्दलीय चुनाव नहीं लड़ा है। लेकिन ये वही सत्तू पाटीदार हैं जिन्होंने पिछले चुनाव में राजकुमार अहीर का टिकट फायनल होने पर समंदर पटेल के साथ साझा प्रेस काँफ्रेंस कर कांग्रेस के ख़िलाफ़ अपनी बगावत का बिगुल बजा दिया था। लेकिन दो रोज बाद उन्हे जावद की बजाए नीमच से टिकट दिया गया तो उन्होंने फिर पाला बदलते हुए कहा था की “कॉंग्रेस हमारी माँ है” ।
महाराज सिंधिया पर भी लगा बड़ा प्रश्नचिन्ह
सिंधिया समर्थक बड़े नेता के भाजपा छोड़ जाने से सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह तो स्वयं महाराज सिंधिया पर लगेगा। प्रदेश में सिंधिया समर्थकों की वफादारी और कट्टरता का कोई सानी नहीं है यह कमलनाथ के तख्ता पलट के वक़्त साबित हो गया था। उस वक़्त कट्टर सिंधिया समर्थकों में कई ने तो अपने मंत्री पद को ठुकरा कर सिंधिया का साथ दिया था। ऐसे में प्रदेश में अब धीरे-धीरे सिंधिया समर्थकों की कॉंग्रेस वापसी से स्वाभाविक तौर पर यह संदेश जाता है की ज्योतिरादित्य सिंधिया की पकड़ उनके समर्थकों में कम हुई है। साथ ही यह आरोप भी सबसे पहले उन पर लगेगा की वे अपने समर्थक को कॉंग्रेस में जाने से रोक नही पाए।
समंदर में उठे ज्वार को रोकने भाजपा संगठन और सखलेचा ने क्या किए जतन !
यही सवाल भाजपा संगठन व मंत्री ओम प्रकाश सखलेचा से भी पूछा जाएगा । आखिर क्यों सखलेचा ने भाजपा प्रदेश कार्य समिती सदस्य समंदर पटेल को मनाने की कोशिश नहीं की ? भाजपा जिलाध्यक्ष पवन पाटीदार ने जरूर यह पहल की और वे बीते दिनों से समंदर पटेल के संपर्क में रहे और मनमुटाव खत्म करने का आग्रह भी किया हालांकी वे इसमे असफल रहें और इसलिए अब पटेल का भाजपा छोड़ना तय हुआ।
नीमच जिले में सखलेचा का सरदर्द हटा तो मनासा में मारू खेमे का सरदर्द बढ़ा
सिंधिया समर्थक समंदर पटेल की कॉंग्रेस वापसी से जावद में भले सखलेचा समर्थकों ने राहत जी सांस ली हो लेकिन यह खबर अब मनासा विधायक माधव मारू का सरदर्द बढ़ाने के लिए काफी है। यह माना जा रहा है की ज्योतिरादित्य सिंधिया की भाजपा में थोडी बहुत भी चली तो मंदसौर-नीमच संसदीय क्षेत्र में एक दो-टिकट तो उनके कोटे से दिए ही जाएंगे। और यहाँ ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों में नीमच जिले में समंदर पटेल के साथ-साथ एक और बड़ा नाम है विजेंदर सिंह मालाहेड़ा का। वह मनासा के पूर्व विधायक हैं और वर्तमान में संसदीय क्षेत्र में सिंधिया समर्थकों में सबसे आगे और मनासा से प्रबल दावेदार हैं । अब समंदर पटेल के कॉंग्रेस में चले जाने से ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने कोटे से कोई एक भी टिकट माँगेगे तो पहला नाम सिर्फ और सिर्फ मनासा से विजेंदर सिंह मालाहेड़ा का ही होगा। ऐसे में अपनी सेकंड इनिंग के लिए तैयार मनासा के वर्तमान विधायक और दावेदार अनिरुद्ध माधव मारू के लिए टिकट वितरण तक का समय काफी माथापच्ची और सरदर्द भरा होगा। और यदि मारू या मालाहेड़ा का संघर्ष बरकरार रहा तो जावद की तरह मनासा में भी कॉंग्रेस को मनोवैज्ञानिक बढ़त तो मिलेगी ही।
इस तरह से समंदर पटेल का भाजपा छोड़ कॉग्रेस में जाना नीमच जिले के विधानसभा चुनावों से पूर्व अटकलों के मंजर को साफ परिदृश्य में बदलता दिखाई दे रहा है। हालांकी राजनीतिक किरदारों और बनते बिगड़ते सियासी समीकरणों के बीच लोकतंत्र में ना तो आम मतदाता की कोई भूमिका महत्वपूर्ण रह गई है और नाही उसके जीवन में किसी आमूल चुल बदलाव की उम्मीद।