सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय में आयोजित हुई भाषाओं के अनुवाद की अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी

उज्जैन। रूस,भारत की संस्कृति से रचा - बसा देश है और सोवियत संघ के विघटन से पहले ही दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान - प्रदान का इतिहास रहा हैं। लेकिन अब संस्कृति के साथ शैक्षणिक आदान - प्रदान का का यह नया दौर सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन से भाषाओं के अनुवाद से शुरू हो रहा हैं जो दोनों देशों के बीच शिक्षा संस्थानों में नई क्रांति उत्पन्न करेगा।
ये विचार सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज ने अंग्रेजी अध्ययनशाला एवं विदेशी भाषा विभाग सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन तथा रशियन विश्वविद्यालय मॉस्को , द पुश्किन इंस्टीट्यूट ऑफ रशियन लैंग्वेज और रशियन हाउस नईदिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में “अनुवाद विमर्श: विज्ञान और व्यवहार का संश्लेषण” विषय पर अंग्रेजी अध्ययनशाला के सभागार में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय सम्बोधन में व्यक्त किए।
सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन द्वारा भारत और रूस के बीच उच्च शिक्षा के क्षेत्र में शैक्षणिक आदान-प्रदान की श्रृंखला के अंतर्गत विश्वविद्यालय परिसर में पहली बार एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कुलगुरु प्रो. भारद्वाज ने कहा कि अनुवाद भाषाओं को ही नहीं, बल्कि देशों और संस्कृतियों को भी जोड़ता है। आज के वैश्विक दौर में अनुवाद के माध्यम से विचारों, ज्ञान और साहित्य का आदान-प्रदान और अधिक सशक्त हुआ है।
प्रो. भारद्वाज कहा कि भारत और रूस दोनों ही सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश हैं और इस तरह की अंतरराष्ट्रीय कार्यशालाएँ दोनों देशों के बीच अकादमिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को नई मजबूती देती हैं। यह कार्यशाला विद्यार्थियों और शोधार्थियों को अनुवाद के सैद्धांतिक ज्ञान के साथ व्यावहारिक अनुभव भी प्रदान करती है।
कुलगुरु प्रो. भारद्वाज ने आयोजन से जुड़े सभी विभागों एवं अंतरराष्ट्रीय अतिथियों की सराहना करते हुए आशा व्यक्त की कि भविष्य में भी इस प्रकार के शैक्षणिक कार्यक्रम विश्वविद्यालय में निरंतर आयोजित होते रहेंगे।
रूस से संगोष्ठी में शामिल होने आई मुख्य अतिथि डॉ. इंदिरा गज़ेविया ने अपने उद्बोधन में अनुवाद की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए अनुवाद विज्ञान एवं उसके व्यावहारिक पक्षों पर विस्तार से चर्चा की। वहीं मॉस्को विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. इंद्रजीत सिंह ने ऑनलाइन माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि हिन्दी-रूसी अनुवाद के क्षेत्र में व्यापक संभावनाएँ मौजूद हैं। कार्यशाला में रूस से पधारीं सुश्री साईं मेखोनोशिना की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यशाला में विद्वानों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता रही।रूस से ऑनलाइन माध्यम से जुड़े अलेक्जेंडर स्टोलीरफ (डायरेक्टर, इंटरनेशनल सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज़) ने भी प्रतिभागियों को संबोधित किया। मॉस्को से रूस विश्वविद्यालय में अध्ययनरत छात्रा एलिना शक्लोव ने अज्ञेय की कविता का हिन्दी पाठ किया, वहीं अनास्टेसिया शीतिकोवा ने महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध कविता “जो तुम आ जाते एक बार” का सस्वर पाठ प्रस्तुत किया। मारग्रेटा एरमलयुले ने हरिवंश राय बच्चन की कविता “बैठ जाता हूँ मिट्टी पर अक्सर” का काव्य पाठ किया।
कार्यक्रम में विदेशी भाषा विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. उमा परिहार एवं डॉ. हसन विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। हिन्दी अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा एवं अर्थशास्त्र अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष डॉ. एस. के. मिश्रा की विशेष उपस्थिति रही।
इस अवसर पर ज्योत्सना शुक्ला (सागर विश्वविद्यालय), मीती शर्मा एवं पुलकीता आनंद (सहायक प्राध्यापक, उच्च शिक्षा विभाग) सहित विदेशी भाषा विभाग के विद्यार्थियों द्वारा रूसी गीत एवं नृत्य की आकर्षक प्रस्तुतियां दी गईं। प्रतीक शिवास, सूजल जायसवाल, अथर्व व्यास, विकास डाबी, देविका नायर एवं पूजा परमार की प्रस्तुतियों ने सभी का ध्यान आकर्षित किया।
कार्यशाला की पीठिका प्रो. बी. के. आंजना ने प्रस्तुत की। जिसमें उन्होंने अनुवाद के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पक्षों को स्पष्ट किया। स्वागत भाषण प्रो. अंजना पांडेय विभागाध्यक्ष अंग्रेजी अध्ययनशाला द्वारा दिया गया। कार्यक्रम का संचालन एवं समन्वय सुश्री निशा चौरसिया (रूसी भाषा संकाय) ने किया।
उद्घाटन सत्र का समापन डॉ. रोनाल्ड फ्रैंकलिन द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों एवं आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में प्रतिभागियों द्वारा रूस के प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया तथा विषय विशेषज्ञों के साथ अनुवाद से जुड़े विविध आयामों पर गहन संवाद हुआ।