
14 Oct 2022
सूर्योपनिषद् के अनुसार समस्त देव, गंधर्व, ऋषि भी
सूर्य रश्मियों में निवास करते हैं।
सूर्य की उपासना के
बिना किसी का कल्याण संभव नहीं है, भले ही अमरत्व
प्राप्त करने वाले देव ही यों न हों। स्कंदपुराण में कहा
गया है कि सूर्य को अर्घ्य दिए बिना भोजन करना, पाप
खाने के समान है। भारतीय चिंतक पद्धति के अनुसार
सूर्योपासना किए बिना कोई भी मानव किसी भी शुभ
कर्म का अधिकारी नहीं बन सकता।
संक्रांतियों तथा सूर्य षष्ठी के अवसर पर सूर्य की
उपासना का विशेष विधान बनाया गया है। सामान्य विधि
के अनुसार प्रत्येक रविवार को सूर्य की उपासना की
जाती है। वैसे प्रतिदिन प्रात:काल रक्तचंदन से मंडल
बनाकर तांबे के लोटे (कलश) में जल, लाल चंदन,
चावल, लाल फूल और कुश आदि रखकर घुटने टेककर
प्रसन्न मन से सूर्य की ओर मुख करके कलश को छाती
के समक्ष बीचों-बीच लाकर सूर्य मंत्र, गायत्री मंत्र का
जाप करते हुए अथवा निनलिखित श्लोक का पाठ करते
हुए जल की धारा धीरे-धीरे प्रवाहित कर भगवान् सूर्य को
अर्घ्य देकर पुष्पांजलि अर्पित करना चाहिए। इस समय
दृष्टि को कलश के धारा वाले किनारे पर रखेंगे, तो सूर्य
का प्रतिबिंब एक छोटे बिंदु के रूप में दिखाई देगा।
एकाग्र मन से देखने पर सप्तरंगों का वलय भी नजऱ
आएगा। फिर परिक्रमा एवं नमस्कार करें।
सिन्दूरवर्णाय सुमण्डलाय नमोऽस्तु
वजाभरणाय तुयम् । पद्माभनेत्राय सुपंकजाय
ब्रह्मेन्द्रनारायणकारणाय ॥
सरक्तचूर्ण ससुबर्णतोयंस्त्रकूकुंकुमाट्यं सकुशं
सपुष्पम् ।
प्रदामादायसहेमपात्रं प्रशस्तमर्घ्य भगवन्
प्रसीद ॥
शिवपुराण कैलास संहिता 6/39-40
अर्थात् सिंदूर वर्ण के से सुंदर मंडल वाले, हीरक
रत्नादि आभरणों से अलंकृत, कमलनेत्र, हाथ में कमल
लिए, ब्रह्मा, विष्णु और इंद्रादि (संपूर्ण सृष्टि) के मूल
कारण हे प्रभो! हे आदित्य! आपको नमस्कार है।
भगवन! आप सुवर्ण पात्र में रक्तवर्ण चूर्ण कुंकुम, कुश,
पुष्पमालादि से युक्त, रक्तवर्णिम जल द्वारा दिए गए श्रेष्ठ
अर्घ्य को ग्रहण कर प्रसन्न हों। उल्लेखनीय है कि इससे
भगवान् सूर्य प्रसन्न होकर आयु, आरोग्य, धन-धान्य,
क्षेत्र, पुत्र, मित्र, तेज, वीर्य, यश, कांति, विद्या, वैभव
और सौभाग्य आदि प्रदान करते हैं । और सूर्यलोक की
प्राप्ति होती है। ब्रह्मपुराण में कहा गया है।
मानसं वाचिकं वापि कायजं यच्च दुष्कृतम् ।
सर्वसूर्यप्रसादेन तदशेषं व्यपोहति ॥
अर्थात् जो उपासक भगवान् सूर्य की उपासना करते
हैं, उन्हें मनोवांछित फल प्राप्त होता है। उपासक के
समुख प्रकट होकर वे उसकी इच्छापूर्ति करते हैं और
उनकी कृपा से मनुष्य के मानसिक, वाचिक तथा
शारीरिक सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
ऋग्वेद में सूर्य से पाप मुक्ति, रोगनाश, दीर्घायु, सुख
प्राप्ति, दरिद्रता निवारण आदि के लिए प्रार्थना की गई है।
वेदों में ओजस्, तेजस् एवं ब्रह्मवर्चस्व की प्राप्ति के लिए
सूर्य की उपासना करने का विधान है। ब्रह्मपुराण के
अध्याय 29-30 में सूर्य को सर्वश्रेष्ठ देवता मानते हुए
सभी देवों को इन्हीं का प्रकाश स्वरूप बताया गया है और
कहा गया है कि सूर्य की उपासना करने वाले मनुष्य जो
कुछ सामग्री सूर्य के लिए अर्पित करते हैं, भगवान्
भास्कर उन्हें लाख गुना करके वापस लौटा देते हैं। स्कंद
पुराण काशी खंड 9/45-48 में सविता सूर्य आराधना
द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष अथात् चतुर्वर्ग की फल प्राप्ति
का वर्णन है। धन, धान्य, आयु, आरोग्य, पुत्र, पशुधन,
विविध भोग एवं स्वर्ग आदि सूर्य की उपासना करने से
प्राप्त होते हैं।
यजुर्वेद अध्याय 13 मंत्र 43 में कहा गया है कि सूर्य
की सविता की आराधना इसलिए भी की जानी चाहिए
कि वह मानव मात्र के समस्त शुभ और अशुभ कमों के
साक्षी हैं। उनसे हमारा कोई भी कार्य या व्यवहार छिपा
नहीं रह सकता।
अग्निपुराण में कहा गया है कि गायत्री मंत्र द्वारा सूर्य
की उपासना-आराधना करने से वह प्रसन्न होते हैं और
साधक का मनोरथ पूर्ण करते हैं।
इसलिए हर दिन भगवान सूर्य को जल देना चाहिए,
विज्ञान भी मानता है इसे बेहद फायदेमंद
सूर्य हमारे जीवन के लिए कितना आवश्यक है यह
बात हम सब जानते हैं सूर्य न सिर्फ हमें बल्कि सपूर्ण
ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान करता है।
पौराणिक काल से ही सूर्य को देवता का
दर्जा प्राप्त है। हाल ही में छठ का पर्व
बीता है जिसमें विशेषकर सूर्य को जल
का अर्घ्य देकर पूजा की जाती है।
वैदिक ज्योतिष और हमारे पुराणों में भी
सूर्य का विशेष महत्व बताया गया है।
हमारे पुराणों में भी सूर्य भगवान की पूजा
और महत्व का उल्लेख मिलता है।
इसलिए हर दिन भगवान सूर्य को
जल देना चाहिए, विज्ञान भी मानता है
इसे बेहद लाभदायक हैं
देशभर में बने सूर्य मंदिर भी सूर्यदेव
में लोगों की धार्मिक आस्था का प्रतीक
है। इसी तरह सूर्य को जल का अर्घ्य
देना और जल अर्पित करना भी एक
महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। आज से नहीं
बल्कि प्राचीनकाल से यह प्रथा चली आ रही है और
आज भी इसका धार्मिक महत्व है
तो चलिए आज बताते हैं सूर्य को अर्घ्य देने के
ज्योतिषीय और वैज्ञानिक कारणों के बारे में।
ऊर्जा की होती है प्राप्ति
सूर्यदेव को जल का अर्घ्य देने के पीछे माना जाता
है कि जो भी मनुष्य सूर्योदय के समय सूर्य को जल
अर्पित करता है उसके दिन की शुरुआत अच्छे से होती
है। प्राचीन काल में लोग तालाब या नदी में स्नान करते
समय सूर्य देवता को अर्घ्य देते थे। धार्मिक
मान्यतानुसार, सुबह उठकर सूर्य देवता के दर्शन करने
और जल अर्पित करने से व्यक्ति की आत्मा और मन को
ऊर्जा मिलती है। यदि यह प्रक्रिया नियमित रूप से की
जाए तो ऐसा माना जाता है कि मनुष्य का सौभाग्य बना
रहता है। न सिर्फ धार्मिक बल्कि ज्योतिष और विज्ञान में
ऐसा करना लाभप्रद बताया गया है चलिए हम आपको
बताएंगे कि ज्योतिषीय और वैज्ञानिक आधार पर सूर्य को
अर्घ्य देना कितना आवश्यक है।
सूर्य को अर्घ्य देने का ज्योतिषीय महत्व
सौरमंडल में सूर्य को निडर और निर्भीक ग्रह माना
गया है। इस आधार पर सूर्य को अर्घ्य देने वाले व्यक्ति
को भी ये विशेष गुण व्यक्ति मिलते हैं। सूर्य को प्रतिदिन
अर्घ्य देने से व्यक्ति कुंडली में सूर्य की स्थिति भी
मजबूत होती है। ज्योतिषविद्या के मुताबिक हर दिन सूर्य
को अर्घ्य देने से व्यक्ति की कुंडली में यदि शनि की बुरी
दृष्टि हो तो उसका प्रभाव भी कम होता है। जो व्यक्ति
विशेष रूप से रोजाना ऐसा करता है तो इससे उसके
जीवन पर पडऩे वाले शनि के हानिकारक प्रभाव भी कम
हो जाते हैं। चंद्रमा में जल का तत्व निहित होता है और
जब हम सूर्य को जल देते हैं तो न सिर्फ सूर्य बल्कि
चंद्रमा से भी बनने वाले शुभ योग स्वयं ही व्यक्ति की
कुंडली में विशेष रूप से सक्रिय हो जाते हैं।
सूर्य को अर्घ्य देने का ज्योतिषीय महत्व
सूर्य को जल चढ़ाने के पीछे न सिर्फ ज्योतिषीय
कारण हैं बल्कि वैज्ञानिक कारण भी बताए गए हैं जैसे,
सूर्य को जल का अर्घ्य देते समय जल की प्रत्येक बूंद
एक माध्यम की तरह काम करती है और वातावरण में
मौजूद विभिन्न जीवाणुओं से सुरक्षा करती हैं। सूर्य को
प्रतिदिन अर्घ्य देने से हमारे आंखों की रोशनी भी तेज
होती है। ऐसा माना जाता है कि सूर्य को अर्घ्य देने का
खास महत्व सुबह का होता है। नियमित तौर पर से सूर्य
को जल का अर्घ्य देने से हमारे शरीर की हड्डियां भी
मजबूत होती हैं योंकि सुबह की सूर्य की किरणें व्यक्ति
को सेहतमंद बनाने में भी मददगार होती हैं, चिकित्सीय
आधार पर सूरज की किरणें हमारे शरीर को स्वस्थ्य रखने
के लिए ऊर्जा प्रदान करती हैं।
इस तरह अर्घ्य देना है लाभप्रद
हम ये समझ चुके हैं कि किस तरह सूर्य को
ज्योतिषीय और वैज्ञानिक आधार पर जल का अर्घ्य
देना आवश्यक है लेकिन हमारे लिए यह भी जानना
जरूरी है कि सूर्य को किस विधि से अर्घ्य देना शुभ
फलदायी हो सकता है। ऐसे में सूर्य को अर्घ्य देने की
सही विधि भी जाननी चाहिए जिससे हमें उससे मिलने
वाले शुभ फल की प्राप्ति हो। सबसे पहले सूर्य को जल
अर्पित किए जाने वाले जल को
लाल चंदन, सिंदूर और लाल फूल
के साथ मिश्रित करें। अर्घ्य देते
समय सूर्य की किरणों पर भी ध्यान
देना चाहिए कि किरणें हल्की हो न
कि बहुत तेज। अर्घ्य देते समय सूर्य
मंत्र 'ओम सूर्याय नम:Ó का 11 बार
जप करना चाहिए, इसके बाद सूरज
की ओर मुंह करते हुए 3 बार
परिक्रमा करनी चाहिए। सूर्य को
अर्घ्य देने के लिए केवल तांबे के
बर्तन या ग्लास का ही इस्तेमाल
करना चाहिए। इस दौरान गायत्री मंत्र
का भी जाप करना भी शुभ माना
जाता है। सूर्य पूर्व दिशा में निकलता
है इसलिए अर्घ्य भी उसी दिशा में
अर्पित करना फलदायी है।