
मंत्र आपके मन को शुद्ध करता है, आत्मा में नया बल का संचार करता है आपके चारों ओर दिव्य प्रकाश का शक्ति पुंज पैदा करता है जो समस्त विघ्नों को एवं पूर्वजन्म के पापों का क्षय कर सर्व प्रकार से अभ्युदय करता है। मंत्र मन को नियंत्रित कर वायु के गमन को उर्ध्वरता करता है एवं चित्त बुद्धि अहं के संयोग से समाधिस्थ होकर परमानन्द की प्राप्त कर अमृत का पान करवाता है। मंत्र जाप वैश्वरी वाणी में जप करने से सामान्य फल तथा उपांशु जप करने से नाभिमंडल में गुंजन प्रारंभ हो जाता है। मानसिक जप करने से हृदयकमल तथा कण्ठ में विशुद्धचक्र जागृत होने लगता है। योगनिद्रा में जप करने का अभ्यास इस समय किया जाय तो उत्तम रहें। साथ ही 'नाद' खुलने से कुछ उत्तम अनुभुति होने लगेगी। मंत्र की गति इस समय तेज हो जाती है। साधक इस समय जप करने के स्थान पर मंत्र का श्रोता हो जाता है यह अवस्था साधना की उन्नति को दर्शाती है।
ध्यान या स्वप्न में मंत्र के स्वर्णाक्षरों में दर्शन या देव दर्शन होना सामान्य शुरुआत है परन्तु योगनिद्रा या प्रगाढ़ ध्यान में विशिष्ट स्वप्र देखकर जाग उठना यह सब कुछ ठीक अवस्था है।
ध्यान में हूं हूं या गर्जना के शब्द करना, गर्दन में कुकुद का भाग ऊंचा होना, सहस्वार में चीटियां चलना, कपाल के १-२ इंच ऊपर तक वायु खिंचाव के लक्षण कुण्डलिनी जागरण के सामान्य लक्षण हैं। साधक अपने आप को सतत प्रयत्नशील रखे पुण्य का क्षय नहीं करे तो उन्नति होकर समाधि का मार्ग खुलकर सहसार में प्रवेश होता है। निरंतर अभ्यास से समाधि के ये अनुभव कल्पनालोक व स्वप्रलोक की तरह दिव्यसरुप के से अनुभव होकर जाग्रत अवस्था में व चलते फिरते अनायास होते रहते हैं। जिनकी परिणति आगे चलकर सहज समाधि अवस्था में होजाती है। धीरे-धीरे व्यक्ति परमहंस अवस्था को प्राप्त रकता है।