
श्राद्ध का पक्ष जीवन में संघर्ष से उत्कर्ष की राह पर गतिशील होने की बेला है। इस कालखंड में स्वयं पर श्रद्धा व विश्वास, आर्थिक स्थिति सुधारने तथा समृद्धि प्राप्ति की उपासनाएं और सकारात्मक विचार व्यक्ति के कर्मों में बदलाव कर बड़ी सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है। लक्ष्मी और ज्ञान की साधना के लिए यह एक उत्तम काल समय है। इस पक्ष का सही प्रयोग जीवन में आमूलचूल परिवर्तन का कारक बनता है। श्रद्धा से किया गया श्राद्ध आपके पूर्वजों तक पहुंचे, न पहुंचे, आपके जीवन में उन्नति और प्रगति का द्वार अवश्य खोल सकता है।
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध के दरमियान पूर्वजों को तेल अर्पित कर उसका दीपदान शनि व कालसर्प जनित कष्टों को नष्ट करने में सहायक होता है।
श्राद्ध में दूध, तिल, तुलसी, सरसों और शहद का अर्पण और तर्पण संघर्ष में कमी करता है, ऐसा मान्यताएं कहती हैं|
सद्गुरु कहते हैं कि श्राद्धपक्ष में केश कतर्न अथार्त बाल न कटवाना न करने का कोई उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता है। यह दंत कथाओं, सुनी-सुनाई बातों या किसी के अनुभव से प्रेरित होकर बाद में प्रचलित परंपराओं पर आधारित है। इनका कोई सुदृढ़ या शास्त्रीय आधार नहीं है।
बाल और नाखून न कटवाने का वैज्ञानिक कारण
इन दिनों में दुख व्यक्त करने के लिए बाल और नाखून नहीं काटे जाते. बाल और नाखून न कटवाने से प्रतीत होता है कि हम शोक में हैं. यानि ये एक तरह से दुख व्यक्त करने का तरीका है|
बाल और नाखून न कटवाने का धार्मिक कारण
बाल और नाखून न कटवाने के पीछे जो धार्मिक कारण बताया गया है. उसके अनुसार नौरात्रि में भगवान की साधना की जाती है. जिस तरह नौरात्रि में बाल और नाखून काटना वर्जित होता है. उसी तरह पितृ देव भी हमारे लिए भगवान स्वरूप हैं. इसलिए इस दौरान भी नाखून और बाल नहीं काटना चाहिए|
पंडित सतीश नागर उज्जैन
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