
मिट्टी का शिवलिंग विनम्रता और त्याग का प्रतीक होता है। इस पर जल से अभिषेक करने से मनोकामनाओं की पूर्ति, दोषों की शांति और भगवान शिव की शीघ्र कृपा प्राप्त होती है। सावन मास और महाशिवरात्रि पर मिट्टी के शिवलिंग का पूजन विशेष पुण्यदायी माना गया है। मिट्टी का शिवलिंग बनाना और उसकी पूजा करना हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। इसे 'पार्थिव शिवलिंग' भी कहते हैं। शिव पुराण के अनुसार, कलियुग में पार्थिव पूजा का विशेष महत्व है क्योंकि यह शीघ्र फल देने वाली और सरल होती है।
मिट्टी के शिवलिंग का महत्व
शीघ्र प्रसन्नता: माना जाता है कि मिट्टी के शिवलिंग की पूजा करने से भगवान शिव प्रसन्न होकर सभी कष्टों का निवारण करते हैं।
मोक्ष और शांति: इसकी पूजा से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और मानसिक शांति मिलती है।
प्रकृति से जुड़ाव: मिट्टी पृथ्वी तत्व का प्रतीक है, जो हमें हमारी जड़ों और प्रकृति से जोड़ती है।
निर्माण विधि और नियम
मिट्टी का चयन: शिवलिंग के लिए किसी साफ स्थान, नदी के किनारे या बेल के पेड़ की जड़ की मिट्टी सबसे उत्तम मानी जाती है। मिट्टी में कंकड़-पत्थर नहीं होने चाहिए।
शुद्धिकरण: मिट्टी को गंगाजल या दूध से शुद्ध करके सानें। इसमें थोड़ा गाय का घी भी मिलाया जा सकता है।
आकार: शिवलिंग का आकार बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए। आमतौर पर यह 12 अंगुल (लगभग 9 इंच) से छोटा होना चाहिए।
पवित्रता: निर्माण करते समय अपना मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें और 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करते रहें।
पूजा और विसर्जन
अभिषेक: शिवलिंग बनाने के बाद उस पर दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल (पंचामृत) से अभिषेक करें।
बेलपत्र: भगवान शिव को प्रिय बेलपत्र और धतूरा अवश्य चढ़ाएं।
विसर्जन: पार्थिव शिवलिंग की विशेषता यह है कि इसे स्थायी रूप से नहीं रखा जाता। पूजा संपन्न होने के बाद इसे किसी पवित्र नदी, तालाब या घर के किसी गमले में आदरपूर्वक विसर्जित कर देना चाहिए।
सोमवार या महाशिवरात्रि के दिन पार्थिव शिवलिंग बनाना अति उत्तम होता है।