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क्या पितृपक्ष में दाढ़ी व बाल कटवाने से पूर्वजों को होता है कष्ट?

श्राद्ध का पक्ष जीवन में संघर्ष से उत्कर्ष की राह पर गतिशील होने की बेला है। इस कालखंड में स्वयं पर श्रद्धा व विश्वास, आर्थिक स्थिति सुधारने तथा समृद्धि प्राप्ति की उपासनाएं और सकारात्मक विचार व्यक्ति के कर्मों में बदलाव कर बड़ी सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है। लक्ष्मी और ज्ञान की साधना के लिए यह एक उत्तम काल समय है। इस पक्ष का सही प्रयोग जीवन में आमूलचूल परिवर्तन का कारक बनता है। श्रद्धा से किया गया श्राद्ध आपके पूर्वजों तक पहुंचे, न पहुंचे, आपके जीवन में उन्नति और प्रगति का द्वार अवश्य खोल सकता है।


– पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध के दरमियान पूर्वजों को तेल अर्पित कर उसका दीपदान शनि व कालसर्प जनित कष्टों को नष्ट करने में सहायक होता है।


– श्राद्ध में दूध, तिल, तुलसी, सरसों और शहद का अर्पण और तर्पण संघर्ष में कमी करता है, ऐसा मान्यताएं कहती हैं


सवाल: पितृपक्ष अशुभ काल समय क्यों है? इसमें शुभ काम क्यों नहीं किया जा सकता? क्या इस पक्ष में पूजा पाठ हो सकता है?-

उत्तर : सद्‌गुरु कहते हैं कि पितृपक्ष बेहद पवित्र काल समय है। इसे अशुभ समझना अज्ञानता है। हां, इस समय भौतिक गतिविधियों को महत्व नहीं दिया जाता है, क्योंकि आध्यात्मिक नजरिया स्थूल समृद्धि और भौतिक सफलता को क्षणभंगुर यानी शीघ्र मिट जाने वाला मानता है। भारतीय दर्शन इस कीमती कालखंड का इतना सस्ता उपयोग नहीं करना चाहता। इस समय में साधना, आराधना, उपासना व पूजन अवश्य किया जा सकता है। सनद (याद) रहे कि ऐश्वर्य की कामना रखकर महालक्ष्मी को प्रसन्न करने वाली समृद्धि की साधना भी इस पक्ष के बिना पूर्ण नहीं होती। महालक्ष्मी आराधना के द्वितीय खंड में इस पक्ष के प्रथम सप्ताह का प्रयोग होता है। संदर्भ के लिए लक्ष्मी उपासना का काल भाद्रपद के शुक्ल की अष्टमी यानि राधा अष्टमी से आरम्भ होकर कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक होता है। परंपराओं के अनुसार इस काल में श्राद्ध, तर्पण, उपासना, प्रार्थना से पितृशांति के साथ जीवन के पूर्व कर्म जनित संघर्ष से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है, ऐसा मान्यताएं कहती हैं


सवाल : क्या यह सत्य है कि पितृपक्ष में दाढ़ी व बाल कटवाने से पूर्वजों की आत्माओं को कष्ट प्राप्त होता है?-

उत्तर: सद्‌गुरु कहते हैं कि श्राद्धपक्ष में केश कतर्न अथार्त बाल न कटवाना न करने का कोई उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता है। यह दंत कथाओं, सुनी-सुनाई बातों या किसी के अनुभव से प्रेरित होकर बाद में प्रचलित परंपराओं पर आधारित है। इनका कोई सुदृढ़ या शास्त्रीय आधार नहीं है।

सवाल: क्या पूर्वजों का श्राद्ध सिर्फ पितृपक्ष में ही हो सकता है? या इसके अलावा भी श्राद्ध संभव है?-

उत्तर: सद्‌गुरु कहते हैं कि हमारी परंपराओं और प्राचीन ग्रंथों में पितृपक्ष के अलावा भी श्राद्ध के काल का उल्लेख प्राप्त होता है। धर्मसिंधु में श्राद्ध के लिए सिर्फ पितृपक्ष ही नहीं, बल्कि 96 काल खंड का विवरण मिलता है, जो इस प्रकार है- वर्ष की

12 अमावास्याएं, 4 पुणादि तिथियां, 14 मन्वादि तिथियां, 12 संक्रांतियां, 12 वैधृति योग, 12 व्यतिपात योग, 15 पितृपक्ष, 5 अष्टका, 5 अन्वष्टका और 5 पूर्वेद्यु:।

सवाल : श्राद्ध कितने प्रकार से हो सकता है?-

उत्तर: मत्स्य पुराण में त्रिविधं श्राद्ध मुच्यते यानी तीन प्रकार के श्राद्ध नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य का और यमस्मृति में नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि और पार्वण इन पांच प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है। परन्तु भविष्य पुराण और विश्वामित्र स्मृति में द्वादश श्राद्धों यथा, नित्य, नैमित्तिक, काम्यम, वृद्धि, सपिण्ड, पार्वण, गोष्ठी, शुद्धयर्थ, कर्मांग, तीर्थ, यात्रार्थ और पुष्टि का उल्लेख करती है।

सवाल: जिनकी मृत्यु की तिथि पता न हो, उनका श्राद्ध कब किया जा सकता है?-

उत्तर: सद्‌गुरु कहते हैं कि जिनकी मृत्यु तारीख पता न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है, ऐसा पारंपरिक अवधारणाएं कहती हैं


पितृ पक्ष के दौरान नहीं कटवाने चाहिए बाल और दाढ़ी, पाप से बचने के लिए जरूर करें ये काम


श्राद्ध पक्ष से जुड़ी कई मान्यताएं और परंपराएं भी हैं, जो इसे खास बनाती है. धर्म ग्रंथों में श्राद्ध से जुड़े कुछ खास नियम भी बताए गए हैं. आगे जानिए इस विषय मे



पितृपक्ष में पितरों का तर्पण और श्राद्ध करने का विशेष महत्व बताया गया है. पितृपक्ष में पितर देव स्वर्गलोक से धरती पर परिजनों से मिलते हैं. ये दोष धन, सेहत और अन्य कई तरह बाधाओं को आमंत्रित करता है. पितृ पक्ष में कई मान्यताएं प्रचलित हैं इनमें से एक है श्राद्ध में बाल कटवाना. इसके पीछे धार्मिक मान्यता ये है कि श्राद्ध के दिनों में बाल कटवाना एक तरह से सुंदर होने से जुड़ा है. चुकिं ये शोक का समय होता है इसलिए बाल, नखुल आदि काटने से मना किया जाता है. लेकिन ज्योतिषियों के अनुसार ग्रंथों में इस प्रकार का कोई उल्लेख नहीं है. ये सुनी-सुनाई या किसी के अनुभव से प्रेरित होती बातें हैं, जो अब परंपरा बन चुकी हैं.


बाल और नाखून न कटवाने का वैज्ञानिक कारण


इन दिनों में दुख व्यक्त करने के लिए बाल और नाखून नहीं काटे जाते. बाल और नाखून न कटवाने से प्रतीत होता है कि हम शोक में हैं. यानि ये एक तरह से दुख व्यक्त करने का तरीका है.


बाल और नाखून न कटवाने का धार्मिक कारण

बाल और नाखून न कटवाने के पीछे जो धार्मिक कारण बताया गया है. उसके अनुसार नौरात्रि में भगवान की साधना की जाती है. जिस तरह नौरात्रि में बाल और नाखून काटना वर्जित होता है. उसी तरह पितृ देव भी हमारे लिए भगवान स्वरूप हैं. इसलिए इस दौरान भी नाखून और बाल नहीं काटना चाहिए.


ब्रह्मचर्य का पालन करें

धर्म ग्रंथों के अनुसार, श्राद्ध पक्ष के दौरान पूरी तरह से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए. मन, वचन और कर्म तीनों के माध्यम से किसी रूप में ब्रह्मचर्य व्रत टूटना नहीं चाहिए. यानी किसी भी तरह के अनुचित विचार में मन में नहीं आना चाहिए. सात्विकता का पालन करते हुए ये 16 दिन पत्नी से दूर रहने का नियम है.


ऐसे बर्तन व आसन का करें उपयोग

पुराणों के अनुसार, श्राद्ध के भोजन के लिए सोने, चांदी, कांसे या तांबे के बर्तन उत्तम माने गए हैं. इनके अभाव में दोना-पत्तल का उपयोग किया जा सकता है. लोहे के आसन पर बैठकर श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए. रेशमी, कंबल, लकड़ी, कुशा आदि के आसन श्रेष्ठ हैं.

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