
3 Oct 2022
आगे जानिए इस दिन देवी के किस रूप की पूजा की जाती है और इसकी पूजा विधि, मंत्र, आरती आदि…
धर्म ग्रंथों में शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व बताया गया है। इस बार ये पर्व 26 सितंबर से 4 अक्टूबर तक मनाया जा रहा हैं। शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिन यानी नवमी तिथि को महानवमी कहा जाता है। धर्म ग्रंथों में इस तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। इस बार ये तिथि 4 अक्टूबर, मंगलवार को है। इस दिन यज्ञ, हवन आदि कार्य विशेष रूप से किए जाते हैं। इसी दिन नवरात्रि अनुष्ठान संपन्न होता है।
आगे जानिए इस दिन देवी के किस रूप की पूजा की जाती है और इसकी पूजा विधि, मंत्र, आरती आदि…
महानवमी पर होती है देवी सिद्धिदात्री की पूजा धर्म ग्रंथों के अनुसार, शारदीय नवरात्रि की नवमी तिथि पर देवी सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मां सिद्धिदात्री की चार भुजाएं हैं। इनकी दाहिनी ओर की पहली भुजा में गदा और दूसरी भुजा में चक्र है। बांई ओर की भुजाओं में कमल और शंख है। इनका आसन कमल का फूल है। देवता, असुर, गंधर्व, किन्नर और मनुष्य सभी इनकी पूजा करते हैं। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व नामक आठ सिद्धियां हैं। ये सभी सिद्धियां मां सिद्धिदात्री की आराधना से प्राप्त की जा सकती है।
इस विधि से करें देवी सिद्धिदात्री की पूजा
नवरात्रि की नवमी तिथि (4 अक्टबूर, मंगलवार) पर एक साफ स्थान पर देवी सिद्धिदात्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। उसी स्थान पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, की स्थापना भी करें। इसके बाद व्रत, पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा माता महागौरी सहित समस्त स्थापित देवताओं की पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अर्ध्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि करें।
ये है दैवी का ध्यान मंत्र
सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना यदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायनी॥
दैवी को ये भोग लगाएं
धर्म ग्रंथों के अनुसार, शारदीय नवरात्रि की नवमी तिथि पर देवी सिद्धिदात्री को अलग-अलग प्रकार के अनाजों का भोग लगाएं। बाद में इन अनाजों को किसी मंदिर के अन्नक्षेत्र में या जरूरतमंदों को दान कर दें। ऐसा करने से जीवन का हर सुख आपको मिल सकता है।
देवी सिद्धिदात्री की कथा
शास्त्रों के अनुसार, देवी दुर्गा का सिद्धिदात्री स्वरूप सभी देवी-देवताओं के तेज से प्रकट हुआ है। भगवान शिव ने मां सिद्धिदात्री की कठोर तपस्या कर आठों सिद्धियों को प्राप्त किया था। साथ ही मां सिद्धिदात्री की कृपा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हो गया था और वह अर्धनारीश्वर कहलाए। मां दुर्गा का यह अत्यंत शक्तिशाली स्वरूप है।
मां सिद्धिदात्री की आरती
जय सिद्धिदात्री तू सिद्धि की दाता, तू भक्तों की रक्षक तू दासों की माता।
तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि, तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि।
कठिन काम सिद्ध कराती हो तुम, हाथ सेवक के सर धरती हो तुम।
तेरी पूजा में न कोई विधि है, तू जगदंबे दाती तू सर्वसिद्धि है।
रविवार को तेरा सुमरिन करे जो, तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो।
तू सब काज उसके कराती हो पूरे, कभी काम उस के रहे न अधूरे।
तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया, रखे जिसके सर पैर मैया अपनी छाया।
सर्व सिद्धि दाती वो है भाग्यशाली, जो है तेरे दर का ही अम्बे सवाली।
हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा, महानंदा मंदिर में है वास तेरा।
मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता, वंदना है सवाली तू जिसकी दाता...
महानवमी : महानवमी: माँ सिद्धिदात्री की पूजा से मिलेगी शांति और समृद्धि, जानिए पूजा विधी और मंत्र
महानवमी के दिन मां दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरुप की पूजा करते हैं। महानवमी को मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से सभी प्रकार के भय, रोग और शोक का समापन हो जाता है। मां सिद्धिदात्री की कृपा से व्यक्ति को सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। अनहोनी से भी सुरक्षा प्राप्त होती है और मृत्यु पश्चात मोक्ष भी मिलता है। महानवमी के दिन कन्या पूजन और नवरात्रि हवन का भी विधान है। नवरात्रि के नौवें यानि आखिरी दिन मां भगवती के नौवें स्वरूप देवी सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना का विधान है। मां सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सभी प्रकार की शक्तियां प्रदान करती हैं। माता का यह स्वरूप सभी दिव्य आकांक्षाओं को पूर्ण करने वाला है। इस दिन विधि विधान से मां सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और रोग, शोक, एवं भय से मुक्ति मिलती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने मां सिद्धिदात्री की पूजा कर सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त किया था। माता की अनुकम्पा से भोलेनाथ का आधा शरीर देवी का हुआ था, इसी कारण वह इस लोक में अर्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए थे।
माँ सिद्धिदात्री की पूजा का महत्त्व
शास्त्रों के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व नामक आठ सिद्धियां हैं। ये सभी सिद्धियां मां सिद्धिदात्री की आराधना से प्राप्त की जा सकती हैं। हनुमान चालीसा में भी अष्टसिद्धि नव निधि के दाता कहा गया है।
कैसे देवी का नाम पड़ा सिद्धिदात्री
माता सिद्धिदात्री के नाम से ही पता चलता है कि वह सभी सिद्धियों का देने वाली हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्माण्ड के प्रारंभ में भगवान रूद्र ने देवी आदि पराशक्ति की आराधना की। ऐसी मान्यता है कि देवी आदि पराशक्ति का कोई स्वरूप नहीं था। शक्ति की सर्वशक्तिमान देवी आदि पराशक्ति सिद्धिदात्री स्वरूप में भगवान शिव के शरीर के बाएं भाग पर प्रकट हुईं।
मां सिद्धिदात्री की पौराणिक कथा
वौदिक शास्त्र के अनुसार भगवान शिव ने मां सिद्धिदात्री की पूजा कर सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त किया था। तथा उनका आधा शरीर नारी का हो गया था, इसलिए उन्हें अर्धनारेश्वर के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पूरे ब्रम्हांड में अंधेरा था यानि कोई संकेत नहीं था, तब उस अंधकार से भरे ब्रम्हांड में ऊर्जा का एक छोटा सा किरण प्रकट हुआ, धीरे धीरे इस किरण ने अपना बड़ा आकार लेना शुरु किया और अंत में इसने एक दिव्य नारी का रूप धारण किया। यह कोई और नहीं बल्कि स्वंय मां सिद्धिदात्री थी। मां सिद्धिदात्री ने प्रकट होकर त्रिदेवों को जन्म दिया, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश प्रकट हुए।
मान्यता है कि माता ने सृष्टि का निर्माण किया था।
वहीं दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार जब सभी देवी देवता महिषासुर के अत्याचार से परेशान हो गए थे। तब त्रिदेवों ने अपने तेज से मां सिद्धिदात्री को जन्म दिया था। जिन्होंने महिषासुर का वध कर तीनों लोक को महिषासुर के अत्याचार से बचाया था।
माँ सिद्धिदात्री की पूजन सामग्री
लाल चुनरी
लाल वस्त्र
मौली
श्रृंगार का सामान
दीपक
घी/ तेल
धूप
नारियल
साफ चावल
कुमकुम
फूल
देवी की प्रतिमा या फोटो
पान
सुपारी
लौंग
इलायची
बताशे या मिसरी
कपूर
फल-मिठाई
कलावा
मां सिद्धिदात्री पूजा विधि
सर्व प्रथम चौकी पर मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद आरती की करें। आरती के बाद हवन करें। हवन करते समय साधक को सभी देवी-देवताओं को याद करना चाहिए। सभी देवी देवताओं के नाम की हवनकुण्ड में एक-एक आहुति दें। फिर मां सिद्धिदात्री का ध्यान लगाएं। मां सिद्धिदात्री से हाथ जोड़कर सुख शांति के लिए प्रार्थना करें और दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्रों के साथ आहुति दें। शक्ति मंत्र ‘ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:’ का उच्चारण करते हुए 108 बार हवनकुण्ड में आहुति दें। 108 आहुति के बाद पूर्ण आहुति दें। इसके बाद नवग्रह शांति के लिए प्रार्थना करें और हवनकुण्ड के चारों तरफ जल अर्पित करें। भगवान शिव और ब्रह्मा जी को स्मरण करें। इसके बाद मां को प्रसाद का भोग लगाएं और स्त्रोत का पाठ करें।
मां सिद्धिदात्री का भोग-
मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री को मौसमी फल, चना, पूड़ी, खीर, नारियल और हलवा अतिप्रिय है। कहते हैं कि मां को इन चीजों का भोग लगाने से वह प्रसन्न होती हैं।
स्त्रोत पाठ
कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।
नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥
परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।
मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥