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जानें कब है राधा अष्टमी, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

उज्जैन /मालवा हेराल्ड /पंडित सतीश नगर /भाद्रपद की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी का त्योंहार मनाया जाता है। कृष्ण जन्म अष्टमी की तरह विशेष कर मथुरा, वृंदावन और बरसाना में बड़े ही धूमधाम और श्रद्वा से मनाया जाता है।


माना जाता है कि राधा रानी का जन्म इसी दिन हुआ था। इसलिए देश के अन्य जगहों पर श्रद्धालु त्योहार को बड़े ही उत्साह से मनाते हैं। ऐसा माना जाता है कि राधाजी तो वृंदावन की अधीश्वरी हैं। यह भी कहा जाता है कि जिसने राधा जी को प्रसन्न कर लिया उसे भगवान कृष्ण भी मिल जाते हैं। इसलिए इस दिन राधा-कृष्ण दोनों की पूजा की जाती है। शास्त्रों में राधा जी को लक्ष्मी जी का अवतार माना गया है। इसलिए इस दिन लक्ष्मी पूजन भी किया जाता है।


कैसे मनाई जाती है राधा अष्टमी


राधा अष्टमी का त्योहार पूरे जोश और उमंग के साथ मनाया जाता है. ब्रज और बरसाना में तो राधा अष्टमी भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की ही तरह धूमधाम से मनाई जाती है. इस दिन लोग बरसाना की ऊंची पहाड़ी पर स्थित गहवर वन की परिक्रमा करते हैं. वृन्दावन के राधा बल्लभ मंदिर में राधा अष्टमी की छटा देखते ही बनती है. मंदिर में राधा रानी के जन्म के बाद उन्हें भोग लगाया जाता है. फिर बधाई गायन होता है और सामुहिक आरती के साथ इसका समापन होता है. इसके अलावा दूसरे मंदिरों में भी राधा के जन्म की खुशियां मनाई जाती हैं और विशेष आरती का आयोजन किया जाता है.


इस दिन लोग व्रत भी रखते हैं.

मान्यता है कि इस व्रत के प्रताप से श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.


राधा अष्टमी का महत्व


राधा-कृष्ण के भक्तों के लिए राधा अष्टमी का विशेष महत्व है. राधा अष्टमी का व्रत करने से सभी पापों का नाश होता है। राधा अष्टमी का व्रत महिलाएं रखती हैं। राधा रानी उनको अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देती हैं। साथ ही घर परिवार में सुख-समृद्धि और शांति रहती है तथा नि:संतानों को संतान सुख प्राप्त होता है। इस दिन व्रत रहने से घर में लक्ष्मी का वास होता है। सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, जीवन सुखमय हो जाता है।


मान्यता है कि इस व्रत को करने से धन की कमी नहीं होती और घर में सौभाग्य आता है. कहते हैं अगर श्रीकृष्ण को प्रसन्न करना है तो राधा की आराधना जरूरी है. यही वजह है कि अपने आराध्य कृष्ण को मनाने के लिए भक्त पहले राधा रानी को प्रसन्न करते हैं.


राधा अष्टमी पूजा विधि


इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करें। फिर स्वच्छ कपड़े पहनें। एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर श्री राधा कृष्ण के युगल रूप की फोटो या प्रतिमा पर फूलों की माला चढ़ाएं। चंदन का तिलक लगाएं। साथ ही तुलसी पत्र भी अर्पित करें। राधा रानी के मंत्रों का जप करें। राधा चालीसा और राधा स्तुति का पाठ करें। श्री राधा रानी और भगवान श्री कृष्ण की आरती करें। आरती के बाद पीली मिठाई या फल चढ़ाएं।


राधा अष्टमी का व्रत कैसे करें


1. सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें.


2. अब पूजा घर के मंडप के नीचे बीचों बीच कलश स्थापित करें.


3. कलश पर तांबे का पात्र / बर्तन रखें. अब राधा जी की मूर्ति को पंचामृत (दूध,दही, शहद, तुलसी दल और घी) से स्नान कराएं.


4. स्नान के बाद राधा जी को सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाएं. अब राधा जी की मूर्ति को कलश पर रखे पात्र पर विराजमान करें


5. इसके बाद विधिवत्त धूप-दीप से आरती उतारें.


6. अब राधा जी को ऋतु फल, मिठाई और भोग में बनाया प्रसाद अर्पित करें.


पूजा के बाद दिन भर उपवास करें.


अगले दिन यथाशक्ति सुहागिन महिलाओं और ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दक्षिणा दें.


सुखी दांपत्य जीवन चाहिए तो रखें राधा अष्टमी व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व


हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण के समान ही राधा जी को भी पूजनीय माना गया है और कृष्ण जन्माष्टमी के समान ही राधा अष्टमी का भी बहुत अधिक धार्मिक महत्व है। हाल ही में देशभर में जन्माष्टमी का पर्व उत्साह के साथ मनाया गया था। कृष्ण जन्माष्टमी पर्व के करीब 15 दिन बाद हर साल राधाष्टमी मनाई जाती है। हिंदू पंचांग के मुताबिक भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली जन्माष्टमी के बाद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी मनाई जाती है।


इस साल राधा अष्टमी 04 सितंबर 2022 को है।


धार्मिक मान्यता है कि राधा अष्टमी व्रत करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है और दांपत्य जीवन में प्रेम बना रहता है। पति पत्नी में प्रेम बना रहने से परिवार में भी शांति बनी रहती है।


राधाष्टमी व्रत करने की विधि


श्री राधाष्टमी व्रत के दिन: सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि क्रियाओं से निवृत होकर श्री राधा जी का पूजन करना चाहिए।


श्री राधा-कृष्ण मंदिर में ध्वजा, पुष्पमाला, वस्त्र, पताका, तोरणादि व विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्नों एवं फलों से श्री राधाजी की स्तुति करनी चाहिए।


भगवान कृष्ण और राधा को फल, फूल, धूप-दीप, भोग आदि अर्पित करें।

- व्रत के दूसरे दिन विवाहित स्त्री को श्रृंगार का सामान, खाने-पीने का सामान आदि का दान देकर व्रत को तोड़ना चाहिए।

- राधा अष्टमी के दिन सिर्फ राधा जी का ही नहीं, बल्कि साथ ही भगवान श्रीकृष्ण की भी पूजा करें।


राधा अष्टमी पर पूजा का शुभ मुहूर्त


03 सितंबर 2022 को दोपहर 12:28 बजे से शुरू होकर 04 सितंबर 2022 को सुबह 10:39 बजे समाप्त होगा। चूंकि उदय तिथि सनातन परंपरा में मान्य है, इस कारण से राधा अष्टमी 04 सितंबर 2022 को मनाई जाएगी।


राधाष्टमी व्रत का धार्मिक महत्व


हिंदू धर्म में श्री कृष्ण को राधा जी के बिना अधूरा माना गया है। राधा के साथ में श्रीकृष्ण की पूजा करने से दोहरा फल मिलता है।


पौराणिक मान्यता के अनुसार


राधा अष्टमी की पूजा करने से विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और अविवाहितों को मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होता है। व्यक्ति के जीवन में हमेशा सुख-शांति बनी रहती है।


लोक मान्यता है कि राधा का जन्म वृषभानु और उनकी पत्नी कीर्ति (कमलवती) से हुआ था, जो गोकुल के पास रावल गांव में रहते थे। देवी राधा का जन्म माता के गर्भ में नहीं हुआ था, जबकि कीर्ति द्वारा देवी योगमाया की पूजा करने के बाद कन्या प्राप्ति हुई थी।


अखंड सौभाग्य के साथ सुख-समृद्धि दिलाता है राधा अष्टमी व्रत, जानें डेट, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि


हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधाष्टमी का व्रत रखा जाता है। यह तिथि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के 15 दिन बाद आती है। इस साल राधाष्टमी व्रत 4 सितंबर 2022 को रखा जाएगा। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण व राधा रानी की विधिवत पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि व खुशहाली आती है। महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।।


जानें राधाष्टमी शुभ मुहूर्त व पूजा विधि-


राधाष्टमी 2022 शुभ मुहूर्त-


पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 03 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 25 मिनट पर शुरू होगी, जिसका समापन 04 सितंबर को सुबह 10 बजकर 40 मिनट पर होगा। उदयातिथि की मान्यता के अनुसार, राधाष्टमी व्रत 04 सितंबर 2022 को रखा जाएगा।


पूजन मुहूर्त-


04 सितंबर को राधाष्टमी पूजन के शुभ समय सुबह 04 बजकर 36 मिनट से सुबह 05 बजकर 02 मिनट तक रहेगा।


राधा अष्टमी व्रत की पूजा विधि-


प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त हो जाएं।

-इसके बाद मंडप के नीचे मंडल बनाकर उसके मध्यभाग में मिट्टी या तांबे का कलश स्थापित करें।

-कलश पर तांबे का पात्र रखें।

- अब इस पात्र पर वस्त्राभूषण से सुसज्जित राधाजी की सोने (संभव हो तो) की मूर्ति स्थापित करें।

-तत्पश्चात राधाजी का षोडशोपचार से पूजन करें।

- ध्यान रहे कि पूजा का समय ठीक मध्याह्न का होना चाहिए।

-पूजन पश्चात पूरा उपवास करें अथवा एक समय भोजन करें।

- दूसरे दिन श्रद्धानुसार सुहागिन स्त्रियों तथा ब्राह्मणों को भोजन कराएं व उन्हें दक्षिणा दें।

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