
27 Jul 2023
गायत्री की पुण्य भावना के प्रवेश करने से पाप का नाश होता है
गायत्री की पुण्य भावना के प्रवेश करने से पाप का नाश होता है। प्रकाश के आगमन के साथ-साथ अन्धकार नष्ट हो जाता है, पुण्य संकल्पों के उदय के साथ-साथ पापों का भी संहार होता है । बल-बुद्धि के साथ-साथ निर्बलता का अन्त हो चलता है। ब्रह्म सन्ध्या की ब्राह्मी भावनाएँ हमारे अघ का मर्षण करती रहती हैं। जब कोई पाप अज्ञान वश हमसे होता है तो क्षमा याचना जरूरी है ताकि ध्यान, एवं आध्यात्मिक जीवन में अग्रसर रहा जा सके...
अघमर्षण के लिये दाहिने हाथ की हथेली पर जल लेकर उसे दाहिने नथुने के समीप ले जाना चाहिये। समीप का अर्थ है - छ: अंगुल दूर। बाँये हाथ के अंगूठे से बायाँ नधुना बन्द कर ले और दाहिने नथुने से धीरे-धीरे साँस खींचना आरम्भ करें। साँस खींचते समय ऐसी भावना करें कि गायत्री माता का पुण्य प्रतीक यह जल अपनी दिव्य शक्तियों सहित पापों का संहार करने के लिये साँस के साथ मेरे अन्दर प्रवेश कर रहा है और भीतर से पापों का, मलों का विकारों का संहार कर रहा है।
जब पूरी साँस खींच चुकें, तो बायाँ नथुना खोल दें और दाहिना नथुना अँगूठे से बन्द रखें और साँस बाहर निकालना आरम्भ करें । दाहिनी हथेली पर रखे हुए जल को अब बाँयें नथुने के सामने करें और भावना करें कि नष्ट हुए पाप का समूह साँस के साथ बाहर निकल कर इस जल में गिर रहा है। 'जब साँस पूरी तरह बाहर निकल जाए, तो उस जल को बिना देखे घृणापूर्वक बाँयीं ओर पटक देना चाहिये । अघमर्षण क्रिया से जल को हथेली में भरते समय 'ॐ भूर्भुवः स्वः' दाहिने नथुने से साँस खींचते समय 'तत्सवितुर्वरेण्यं' इतना मन्त्र भाग जपना चाहिये और बाँयें नथुने से साँस छोड़ते समय 'भर्गो देवस्य धीमहि' और जल पटकते समय 'धियो यो नः प्रचोदयात्' इस मंत्र का उच्चारण करना नक्षत्र है। यह क्रिया तीन बार करनी चाहिये जिससे काया के, प्राण के मन के त्रिविध पापों का संहार हो सके।