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कब है ऋषि पंचमी, जानिए शुभ मुहूर्त व कैसे रखा जाता है यह व्रत

31 Aug 2022

हिंदू पंचांग के अनुसार इस साल ऋषि पंचमी का व्रत 1 सितंबर को रखा जाएगा। यह व्रत महिलाएं रखती हैं। हिंदू धर्म में ऋषि पंचमी का विशेष महत्व है। इस दिन सप्त ऋषि की पूजा का विधान है।

मालवा हेराल्ड |हिंदू पंचांग के अनुसार इस साल ऋषि पंचमी का व्रत 1 सितंबर को रखा जाएगाहिंदू धर्म में ऋषि पंचमी के व्रत का विशेष महत्व बताया गया हैइस दिन सप्त ऋषि की पूजा की जाती है, यह व्रत खासतौर से महिलाएं रखती हैं


जानिए, कब है ऋषि पंचमी


हिंदू पंचांग के अनुसार इस साल ऋषि पंचमी का व्रत 1 सितंबर को रखा जाएगा हिंदू धर्म में ऋषि पंचमी के व्रत का विशेष महत्व बताया गया है

इस दिन सप्त ऋषि की पूजा की जाती है, यह व्रत खासतौर से महिलाएं रखती हैं

भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन ऋषि पंचमी का व्रत रखा जाता है।


हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार ऋषि पंचमी व्रत महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़ा है।


ऐसी मान्यता है कि मासिक धर्म के दौरान अगर महिलाओं से जाने अनजाने में कोई गलती हो जाए तो इस व्रत को रखकर वे सभी दोषों से मुक्ति पा सकती हैं। ऋषि पंचमी को भाई पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। जानकारी के मुताबिक इस दिन माहेश्वरी समाज राखी का त्योहार मनाता हैं।


आइए जानते हैं ऋषि पंचमी व्रत का शुभ मुहूर्त व कैसे रखें यह व्रत।

जानिए, ऋषि पंचमी व्रत का शुभ मुहूर्त


- ऋषि पंचमी तिथि प्रारंभ - 31 अगस्त 2022 को 03:22 पीएम बजे

- ऋषि पंचमी तिथि समाप्त - 01 सितंबर 2022 को 02:49 पीएम बजे

- ऋषि पंचमी 2022 पूजा मुहूर्त - 1 सितंबर 2022 सुबह 11: 05 एएम से 01: 37 पीएम तक


ऐसे करें पूजा


इस व्रत को रखने वाली महिलाएं सूर्योदय के समय घर साफ करके व स्नान करके नए वस्त्र धारण कर लें। इसके बाद पूजा घर में आसन पर बैठकर एक चौकी तैयार करें। चौकी में हल्दी, कुमकुम से चौकोर मंडल बनाकर सप्तऋषि की स्थापना करें। इसके बाद पंचामृत व गंगाजल का छिड़काव करें। इसमें चंदन का तिलक लगाएं। इसके साथ ही फूल, माला अर्पित करें। फिर वस्त्र व जनेऊ अर्पित करें।


इसके बाद सप्त ऋषि को फलों व मिठाई का भोग लगाएं। भोग लगाने के बाद धूप दीपक जलाकर आरती व सप्तऋषि के पूजन मंत्र का जाप करें।


सप्तऋषि पूजन का मंत्र -


'कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोथ गौतमः। जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥दहन्तु पापं सर्व गृह्नन्त्वर्ध्यं नमो नमः'॥' यह व्रत फलाहारी रखा जाता है।


ऋषि पंचमी व्रत का उद्देश्य, पूजा विधि, व्रत कथा. ऋषि पंचमी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान


ऋषि पंचमी हिंदू धर्म में एक शुभ त्यौहार माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह दिन भारत के ऋषियों का सम्मान करने के लिए होता है। ऋषि पंचमी का अवसर मुख्य रूप से सप्तर्षि के रूप में सम्मानित सात महान ऋषियों को समर्पित किया जाता है। पंचमी शब्द पांचवें दिन से संबंधित होता है और ऋषि का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार, ‘ऋषि पंचमी’ का पवित्र दिन को महान भारतीय ऋषियों की यादों के रूप में मनाया जाता है। यह शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन (पंचमी तीथी) की भद्रपद महीने में मनाया जाता है।


आम तौर पर यह त्यौहार गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद मनाया जाता है और हरतालिका तीज के दो दिन बाद मनाया जाता है। यह त्यौहार सप्तर्षि से जुड़ा हुआ है जोकि सात ऋषि हैं जिन्होंने पृथ्वी से बुराई को खत्म करने के लिए अपने जीवन का त्याग किया था और मानव जाति के सुधार के लिए काम किया था। यह महान ऋषि सिद्धांतबद्ध और अत्यधिक धार्मिक माने जाते थे और उन्होंने अपने भक्तों को भलाई और मानवता का मार्ग लेना सिखाया था। हिंदू मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार संत द्वारा अपने भक्तों को अपने ज्ञान और बुद्धि से शिक्षित किया करते थे, जिससे कि हर कोई दान, मानवता और ज्ञान के मार्ग का पालन कर सके।


मासिक धर्म के दौरान महिलाओं द्वारा अनजाने में की गई भूल की क्षमा याचना के लिए हिंदू धर्म में ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है।


ऋषि पंचमी व्रत करने का उद्देश्य


पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर इस व्रत को विधि विधान से पूजा करने से व्यक्ति का कल्याण होता है। इस दिन सप्त ऋषियों की पांरपरिक पूजा करने का विधान होता है। इन सात ऋषियों के नाम – ऋषि कश्यप, ऋषि अत्रि, ऋषि भारद्वाज, ऋषि विश्वमित्र, ऋषि गौतम, ऋषि जमदग्नि और ऋषि वशिष्ठ है। इन् ऋषि यों द्वारा समाज कल्याण के लिए काम किया जाता था। इसलिए उनके सम्मान में यह व्रत और पूजन किया जाता हैं।


हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों के अनुसार कोई भी व्यक्ति खासकर महिलाओं द्वारा इस दिन सप्त ऋषियों का पूजन करने से सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। प्राचीन किवंदति है कि महिलाओं को रजस्वला दोष लगता है। इसलिए कहां जाता हैं कि ऋषि पंचमी व्रत करने से मासिक धर्म के दौरान भोजन को दूषित किए जाने वाले पाप से मुक्ति की प्राप्ति होती है।


ऋषि पंचमी की व्रत विधि


भाद्र शुक्ल पंचमी को ऋषि पंचमी कहा जाता हैं। इस व्रत को स्त्री मनुष्य जीवन में किए गए पापों की मुक्ति के लिए किया जाता है।

ऋषि पंचमी का व्रत रखने वाले व्यक्ति को किसी नदी या जलाशय में स्नान करके उसके द्वारा आंगन बेदी बनाई जाती है।

इस दिन अनेक रंगों से रंगोली बनाकर उस पर मिट्टी या ताँबे का घट (कलश) स्थापित किया जाता है।

कलश को वस्त्र से लपेटकर उसके ऊपर ताँबे या मिट्टी के बर्तन में जौ भरकर रखा जाता है।

इसके बाद कलश का फूल, गंध और अक्षत आदि से पूजा की जाती है।

इस दिन प्रायः लोग द्वारा दही और साठी का चावल खाया जाता हैं। इस व्रत के दिन नमक का प्रयोग नहीं किया जाता है। दिन में केवल एक ही बार भोजन किया जाता है।

ऋषि पंचमी व्रत के दिन कलश आदि पूजन सामग्री को ब्राह्मण को दान दिया जाता है।

पूजन के बाद ब्राह्मण भोजन कराकर ही खुद प्रसाद लेना चाहिये।


ऋषि पंचमी व्रत का उद्देश्य, पूजा विधि, व्रत कथा. ऋषि पंचमी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान


ऋषि पंचमी हिंदू धर्म में एक शुभ त्यौहार माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह दिन भारत के ऋषियों का सम्मान करने के लिए होता है। ऋषि पंचमी का अवसर मुख्य रूप से सप्तर्षि के रूप में सम्मानित सात महान ऋषियों को समर्पित किया जाता है। पंचमी शब्द पांचवें दिन से संबंधित होता है और ऋषि का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार, ‘ऋषि पंचमी’ का पवित्र दिन को महान भारतीय ऋषियों की यादों के रूप में मनाया जाता है। यह शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन (पंचमी तीथी) की भद्रपद महीने में मनाया जाता है।


आम तौर पर यह त्यौहार गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद मनाया जाता है और हरतालिका तीज के दो दिन बाद मनाया जाता है। यह त्यौहार सप्तर्षि से जुड़ा हुआ है जोकि सात ऋषि हैं जिन्होंने पृथ्वी से बुराई को खत्म करने के लिए अपने जीवन का त्याग किया था और मानव जाति के सुधार के लिए काम किया था। यह महान ऋषि सिद्धांतबद्ध और अत्यधिक धार्मिक माने जाते थे और उन्होंने अपने भक्तों को भलाई और मानवता का मार्ग लेना सिखाया था। हिंदू मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार संत द्वारा अपने भक्तों को अपने ज्ञान और बुद्धि से शिक्षित किया करते थे, जिससे कि हर कोई दान, मानवता और ज्ञान के मार्ग का पालन कर सके।


मासिक धर्म के दौरान महिलाओं द्वारा अनजाने में की गई भूल की क्षमा याचना के लिए हिंदू धर्म में ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है।


ऋषि पंचमी की व्रत कथा

सत्ययुग में श्येनजित् नामक एक राजा का राज्य था। उस राजा के राज्य में सुमित्र नाम का एक ब्राह्मण रहता था। जोकि वेदों का विद्वान था। सुमित्र खेती करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उसकी पत्नी का नाम जयश्री सती थी, जो कि साध्वी और पतिव्रता थी। वह खेती के कामों में भी अपने पति का सहयोग किया करती थी। एक बार उस ब्राह्मण की पत्नी ने रजस्वला अवस्था में अनजाने में घर का सब काम किया और पति का भी स्पर्श भी कर लिया। दैवयोग से पति-पत्नी का शरीरान्त एक साथ ही हुआ। रजस्वला अवस्था में स्पर्शा का विचार न रखने के कारण स्त्री को कुतिया और पति को बैल की योनि की प्राप्ति हुई। परंतु पहले जन्म में किये गये अनेक धार्मिक कार्य के कारण उनका ज्ञान बना रहा। संयोग से इस जन्म में भी वह साथ-साथ अपने ही घर में अपने पुत्र और पुत्रवधू के साथ रह रहे थे। ब्राह्मण के पुत्र का नाम सुमति था। वह भी पिता की की तरह वेदों में विद्वान था। पितृपक्ष में उसने अपने माता-पिता का श्राद्ध करने के उद्देश्य से पत्नी से खीर बनवायी और ब्राह्मणों को निमंत्रण दिया गया। उधर एक सांप ने आकर खीर को जहरीला कर दिया। कुतिया बनी ब्राह्मणी ने यह सब देख लिया। उसने सोचा कि यदि इस खीर को ब्राह्मण खायेंगे तो जहर के प्रभाव से मर जायेंगे और सुमति को इसका पाप लगेगा। ऐसा सोच कर उसने सुमति की पत्नी के सामने ही जाकर खीर को छू दिया। इस पर सुमति की पत्नी को बहुत गुस्सा आया और उसने चूल्हे से जलती लकड़ी निकालकर उसकी पिटाई कर दी। उस दिन सुमति की पत्नी ने कुतिया को भोजन भी नहीं दिया। रात में कुतिया ने बैल को सारी घटना बताई। बैल ने कहा कि आज तो मुझे भी कुछ खाने को नहीं दिया गया। जबकि मुझसे दिनभर काम लिया जाता है। उसने कहा की सुमति ने हम दोनों के ही उद्देश्य से श्राद्ध किया था और हमें ही भूखा रखा हुआ है। इस तरह हम दोनों के भूखे रह जाने से तो इसका श्राद्ध करना ही व्यर्थ हो जाएगा। सुमति दरवाजे पर लेटा कुतिया और बैल की बातचीत सुन रहा था। वह पशुओं की बोली अच्छी तरह समझता था। उसे यह जानकर बहुत दुःख हुआ कि उसके माता-पिता इन निकृष्ट योनियों में पड़े हैं। वह दौड़ता हुआ एक ऋषि के आश्रम में गया उसने उनसे अपने माता-पिता के पशुयोनि में पड़ने का कारण और मुक्ति का उपाय पूछा। ऋषि ने ध्यान और योगबल से सारा हाल जान लिया। सुमति से कहा कि तुम पति-पत्नी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषि पंचमी का व्रत करना होगा और उस दिन बैल के जोतने से पैदा हुआ कोई भी अन्न नहीं खाना होगा। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे माता-पिता की मुक्ति प्राप्त हो जायेगी। यह सुनकर मातृ-पितृ भक्त सुमति द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत किया गया जिसके प्रभाव से उसके माता-पिता को पशुयोनि से मुक्ति प्राप्त हो गई।


ऋषि पंचमी पर किए जाने वाले अनुष्ठान


ऋषि पंचमी को सभी रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों को अच्छे इरादे और शुद्ध दिल के साथ किया जाना चाहिए।

व्यक्तियों के इरादे शरीर और आत्मा के शुद्धिकरण के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


भक्त सुबह उठते हैं और उठने के बाद ही पवित्र स्नान किया जाता है।


लोगों द्वारा इस दिन एक कठोर ऋषि पंचमी व्रत रखा जाता है।


इस व्रत को रखने का मुख्य उद्देश्य एक व्यक्ति को पूरी तरह से पवित्र किया जाना है।


व्यक्ति को जड़ी बूटी के साथ दांतों की सफाई करनी चाहिए और जड़ी बूटी के साथ स्नान करना चाहिए।


इन सभी जड़ी बूटियों का मुख्य रूप से शरीर के बाहरी शुद्धिकरण के लिए उपयोग किया जाता है और मक्खन, तुलसी, दूध, और दही का मिश्रण आत्मा की शुद्धिकरण के लिए पिया जाता है।

इस दिन, भक्त सात महान संतों के सप्तऋषि की पूजा की जाती है जो सभी अनुष्ठानों के अंतिम पहलू का अंतिम भाग होता है।


सभी सात ऋषियों की उपस्थिति का आह्वान करने के लिए, प्रार्थनाओं और कई पवित्र चीजें जैसे फूल और खाद्य उत्पादों का प्रयोग किया जाता है।


ऋषि पंचमी तिथि गुरुवार, 01 सितंबर 2022 को होगी।


ऋषि पंचमी पूजा मुहूर्त सुबह 11:05 बजे से दोपहर 01:37 बजे तक होगा।

ऋषि पंचमी तिथि 31 अगस्त 2022 को सुबह 03:22 बजे प्रारंभ होगी।

ऋषि पंचमी तिथि 01 सितंबर 2022 दोपहर 02:49 बजे समाप्त होगी।


ऋषि पंचमी से संबंधित प्रश्न


(Q:1) ऋषि पंचमी क्यों मनाई जाती है?

(Ans) यह व्रत ज्ञात-अज्ञात पापों के शमन के लिये किया जाता है, इसके अलावा स्त्री-पुरुष दोनों द्वारा इस व्रत को किया जाता हैं। स्त्रियों से रजस्वला अवस्था में जाने-अनजाने घर के पात्र आदि वस्तुओं का प्रायः स्पर्श हो जाता है, इससे होने वाले पाप के मुक्ति के लिये इस व्रत को किया जाता हैं।


(Q:2) ऋषि पंचमी में क्या खाना चाहिये?

(Ans) इस दिन प्रायः लोग दही और साठी का चावल खाना चाहिए। नमक का प्रयोग करना वर्जित माना जाता है। दिन में केवल एक ही बार भोजन करना चाहिये।


(Q:3) ऋषि पंचमी किस भारतीय माह में मनाई जाती है?

(Ans) हिंदू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद (भादो) के महिने की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी मनाई जाती है।


(Q:4) ऋषि पंचमी के दिन कौन से 7 ऋषियों की पूजा की जाती है?

(Ans) ऋषि पंचमी के दिन ऋषि कश्यप, ऋषि अत्रि, ऋषि भारद्वाज, ऋषि विश्वमित्र, ऋषि गौतम, ऋषि जमदग्नि और ऋषि वशिष्ठ की पूजा की जाती है।


आज मनाई जाएगी ऋषि पंचमी


महिलाओं के लिए विशेष लाभकारी है यह व्रत

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आज यानी 1 सितम्बर को ऋषि पंचमी है। ऋषि पंचमी का व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी को किया जाता है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा की जाती है। यह व्रत गणेश चतुर्थी के अगले दिन और हरतालिका तीज के दूसरे दिन किया जाता है। इस व्रत के बारे में ब्रह्माजी ने राजा सिताश्व को बताया था। एक बार राजा सिताश्व ने ब्रह्माजी से ऐसे व्रत के बारे में जानना चाहा जिसके करने से प्राणियों के समस्त पापों का नाश हो जाता है। तब ब्रह्माजी ने उन्हें ऋषि पंचमी के व्रत के बारे में बताया।


ऋषि पंचमी व्रत कथा


विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी, जिसका नाम सुशीला था। उस ब्राह्मण के एक पुत्र तथा एक पुत्री दो संतान थी। विवाह योग्य होने पर उसने समान कुलशील वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया। दैवयोग से कुछ दिनों बाद वह विधवा हो गई। दुखी ब्राह्मण दम्पति कन्या सहित गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे।


एक दिन ब्राह्मण कन्या सो रही थी कि उसका शरीर कीड़ों से भर गया। कन्या ने सारी बात मां से कही। मां ने पति से सब कहते हुए पूछा- प्राणनाथ! मेरी साध्वी कन्या की यह गति होने का क्या कारण है?

उत्तंक ने समाधि द्वारा इस घटना का पता लगाकर बताया- पूर्व जन्म में भी यह कन्या ब्राह्मणी थी। इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू दिए थे। इस जन्म में भी इसने लोगों की देखा-देखी ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़े हैं।

धर्म-शास्त्रों की मान्यता है कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। यदि यह शुद्ध मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी।


पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह सारे दुखों से मुक्त हो गई। अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित अक्षय सुखों का भोग मिला।


ऋषि पंचमी पूजा विधि

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ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार ऋषि पंचमी के दिन महिलाएं घर में साफ-सफाई करके पूरे विधि विधान से सात ऋषियों के साथ देवी अरुंधती की स्थापना करती हैं। सप्त ऋषियों की हल्दी, चंदन, पुष्प अक्षत आदि से पूजा करके उनसे क्षमा याचना कर सप्तऋषियों की पूजा की जाती है। पूरे विधि- विधान से पूजा करने के बाद ऋषि पंचमी व्रत कथा सुना जाता है तथा पंडितों को भोजन करवाकर कर व्रत का उद्यापन किया जाता है।


ऋषि पंचमी पूजा में इन मंत्रों का करें जाप

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कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोय गौतम:।

जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषय: स्मृता:।।

गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं तुष्टा भवत मे सदा।।


ऋषि पंचमी व्रत फल

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इस दिन व्रत रखकर पूरे विधि- विधान से सप्तर्षियों की पूजा करने से व्यक्ति के सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। अविवाहित स्त्रियों के लिए यह व्रत बेहद महत्त्वपूर्ण और फलकारी माना जाता है। इस दिन हल से जोते हुए अनाज को नहीं खाया जाता अर्थात जमीन से उगने वाले अन्न ग्रहण नहीं किए जाते हैं।

ऋषि पंचमी का व्रत करने से अत्यंत लाभ प्राप्त होता है, यह व्रत करने से महिलाओं को मासिक धर्म में हुई जाने अनजाने में हुई गलतियों के दोषों से मुक्ति प्राप्त होती है। ऋषि पंचमी का व्रत करके महिलाएं जान- अनजाने में हुए पापों से मुक्ति पा सकती है। वैसे भी यह व्रत विशेषकर महिलाओं के लिए ही है। यह व्रत करके महिलाएं अपने जीवन के कई दोषों से मुक्ति पा सकते हैं। इस दिन सप्तऋषियों के साथ- साथ गुरु वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति की भी पूजा की जाती है।


ऋषि पंचमी व्रत के लाभ

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01. ऋषि पंचमी का व्रत विशेष रूप से महिलाएं मासिक धर्म में हुई धार्मिक गलतियों और दोषों से रक्षा के लिए करती हैं। माना जाता है यह व्रत करने से इन सभी दोषों से मुक्ति मिल जाती है।

02. ऋषि पंचमी के व्रत में अपामार्ग को पौधे को विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन अपामार्ग के पौधे से दातुन और स्नान करने के उपरातं ही यह व्रत पूर्ण माना जाता है। ऋषि पंचमी का यह व्रत सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है।

03. ऋषि पंचमी का व्रत प्रत्येक वर्ग की महिला कर सकती है। इस व्रत के पुण्यफल से सभी प्रकार के पापों का क्षय होता है। इसलिए यह व्रत महिलाओं के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है।

04. ऋषि पंचमी का यह व्रत सुहागन स्त्रियों के साथ-साथ कुंवारी कन्याएं भी कर सकती है लेकिन यह व्रत मनोवांछित और योग्य वर पाने के लिए नहीं किया जाता बल्कि अन्य दोषों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है।

05. ऋषि पंचमी के दिन गंगा स्नान को अधिक महत्व दिया जाता है। इसलिए गंगा स्नान अवश्य करें और उसके बाद ही सप्तऋषि की पूजा करें।

06. ऋषि पंचमी के दिन जमीन से बोया हुआ अनाज नहीं खाया जाता अगर कोई महिला ऐसा करती है तो उसे सप्तऋषियों का श्राप मिलता हैं और उसे जीवन में अनेकों कष्टों का सामना करना पड़ता है।

07. ऋषि पंचमी के दिन ऋषि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति की भी पूजा की जाती है। इसलिए सप्तऋषि के साथ- साथ देवी अरुंधति की भी पूजा अवश्य करें। ऐसा करने से आपको मासिक धर्म में होने वाली पीड़ा से मुक्ति मिलेगी।

08. ऋषि पंचमी के सात वर्षों के बाद आठवें वर्ष में सप्त ऋषियों की सोने की प्रतिमा बनाकर ब्राह्मण को दान दी जाती है। ऐसा करने से ही यह व्रत पूर्ण माना जाता है।

09. मासिक धर्म में किसी ब्राह्मण को भोजन कराने के पाप से मुक्ति दिलाता है ऋषि पंचमी का व्रत।

10. ऋषि पंचमी का व्रत मासिक धर्म में किसी पूजा के समान को हाथ लगाने के पाप से भी मुक्ति दिलाता है।।

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