
योगी किसे कहा जाय ? इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि योगी सदा प्रसन्न रहता है, इस प्रसन्नता के कारण सब दुःखों से वह दूर रहता है और वही - प्रसन्नचित्तता उसे भौतिकता या बाह्य आडंबरों से निकालकर, अंर्तमुख बनाती है। और वह उस ध्यान में मग्न हो सकता है। प. पू. श्रीमाताजी द्वारा प्रणित सहजयोग आपको प्रसन्नता की कुँजी प्रदान करता है। हम जीवन मे जो भी कार्य करते हैं इसका प्रयोजन केवल आनंद ही है।
उदाहरणार्थ आप पढ़कर नौकरी करना चाहते हैं, आनंद के लिये, जो कपड़े या और सभी चीजें खरीदते हैं, आनंद के लिये। परन्तु किसी भी पदार्थ व वस्तु से जो आनंद आप पाते हैं वो आनंद शाश्वत नहीं होता, क्षणिक होता है। आपको सहज योग में जब आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है तो पहले ही दिन आपको निर्विचार ध्यान मिलता है।। आपकी माँ स्वरूपिणी कुंडलिनी शक्ति आपको प्रेममयी चैतन्य लहरियां प्रदान करती है और अनायास ही आप दिन-प्रतिदिन आनंदी, प्रसन्नचित्त बनते जाते हैं। बाहरी मान-अपमान या सुख-दुख का आपके ऊपर प्रभाव नहीं पड़ता। आपका चित्त, स्थिर, शांत और एकाग्र हो जाता है। आप अपने विचारों व वाइब्रेशंस की तरफ तटस्थ भूमिका से देखने लगते हैं और धीरे-धीरे अपना चित्त सहस्त्रार पर स्थिर करने की दिव्य कला सीखते हैं। आप ध्यान करते नहीं आप ध्यान में होते हैं। ध्यान में रहने का मतलब है आप वर्तमान में जीते हैं, आपके पास जो अच्छा है, उसे प्रसन्नता से समाज को देने के लिये उत्सुक रहते हैं। विश्व के सभी सहजयोगियों की केवल एक ही शुद्ध इच्छा रहती है कि उन्हें सहजयोग के माध्यम से जो प्रसन्नता, स्थिरता व समाधान प्राप्त हुआ है, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जो सफलता प्राप्त हुई है वे सब सुख जगत में सभी को प्राप्त हों व शास्त्रों में वर्णित शाश्वत सत्य से सभी का साक्षात् हो सके। श्री माताजी प्रसन्नता की व्याख्या करते हुए कहती हैं कि सहज योग में, आप समझ सकते हैं कि आपको धर्म में कितना आनंद मिलता है। आप दुनिया की सारी दौलत और ताकत एक तरफ रख सकते हैं, लेकिन धर्म से मिलने वाला सुख अमूल्य है।