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सहजयोग ध्यान से साधक सूर्य सम प्रकाशमय व ऊर्जामय हो जाता है

श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथ कोटिभ:।

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:।


हमारे सारे धर्मग्रंथ सदैव इस बात का प्रतिपादन करते हैं कि ʼब्रह्म तत्वʼ जो अपनी आँखो से  नही देखा जा सकता, जो अदृष्य है वह तत्व नित्य  है, सत्य है और यह सारा संसार, नामरूपात्मक जग, जो हर क्षण बदल रहा है, वह  दृष्य होते  हुए भी  मिथ्या है, नाशवान है। यह ब्रह्म  तत्व ही आत्मतत्व  है,और जिस किसी को इस  आत्म तत्व की अनुभूति होती है, वह व्यक्ति ,उस आत्मानुभूति को व्यक्त किये बगैर नहीं रह सकता। मराठी साहित्य के जाने-माने संत श्री तुकाराम महाराज अपने अभंग में लिखते हैं।


गोडपणे जैसा गुळ । तैसा देव झाला सकळ। आता भजो कोणेपरी । देव सबाह्य अन्तरी ।।


अर्थात उस आत्मतत्व की अनुभूति उन्हे गुड़ जैसी मधुर लगती है। और इस सारी सृष्टि में और अपने अंतरंग में भी उन्हे उस तत्व का अनुभव होता है।


प. पू. श्री माताजी प्रणित सहज योग भी अंतरंग अनुभूति की, ब्रम्ह का साक्षात्कार पाने की ही बात करता है।  जब सहजयोग में साधक को साक्षात्कार प्राप्त होता है तब उस साधक का जीवात्मा से ब्रह्मात्मा की ओर अंतरंग प्रवास शुरू हो जाता है। जब साधक को ध्यान में निर्विचारिता की एक झलक प्राप्त होती है  तब वह उस निर्विचार  ध्यान को पुन: पुन: प्राप्त करना चाहता है।


प. पू. श्री माताजी कहते है, जैसे ही आप निर्विचार में होना शुरू कर - देंगे। आप देखियेगा आपके अंदर ये तीनों शक्तियाँ अपने आप बन जायेंगी,  अपने आप सुलझ जायेंगी 'धर्म-अर्थ- और काम', बिल्कुल वो ठीक से अपनी-अपनी जगह बैठ जायेंगी,... एक छोटी सी चीज है, निर्विचार  मे रहना सीखिये, कोई सा भी आपका प्रश्न हो, निर्विचार मे रहो, आपका शरीर ठीक रखो, मन ठीक रखो। प्रथम बात यह है कि आप सभी सत्य से तादात्म कर सकते हैं, असत्य से नहीं। परमात्मा से एकात्मकता, प्रभु परमेश्वर से दोस्ती जोड़ो, उसके सर्वशक्तिमान स्वरूप में एकाकार होना है,....सत्य तो आप सब जानते है, उस सत्य को ही हमें पाना है, मैं तुम सबको सूर्य बनाना चाहती हूं। इसके सिवाय मैं और कुछ  नहीं चाहती  हूँ। इसप्रकार श्रीमाताजी ने ब्रम्ह - साक्षात्कार पाने के बाद आने वाली निर्विचारिता की व्याख्या की है |  आप भी अगर अपने अंतस्थ  सूर्य  की खोज में है, तो  आज ही सीखें सहजयोग ध्यान |

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