
दो साल के लॉकडाउन के पश्चात आज हम सभी लोग फिर से श्रवण मास में आने वाले त्योहारों की बड़ी उत्सुकता से राह देख रहे हैं।"मच गया शोर सारी नगरी रे, आया बिरज का बांका संभाल तेरी गगरी रे" इस गाने को जन्माष्टमी या दही हांडी के अवसर पर हम सब ने कई बार सुना है। वैसे तो भगवान श्री कृष्ण के नटखट स्वभाव से हम सभी भलीभांति परिचित हैं लेकिन उनकी लीलाओं का "सहजयोग" से क्या संबंध है यह शायद ही कोई जानता होगा।
सबसे पहले हम 'सहजयोग' क्या है इसके बारे में थोड़ा सा जान लेते हैं। प. पू. श्री माताजी निर्मला देवी द्वारा संचालित सहजयोग ध्यान पद्धति संपूर्ण मानव जाति के लिए एक अद्वितीय देन है। "सह" का अर्थ है "साथ में" और "ज" का अर्थ है "जन्मा हुआ" अर्थात जन्म के साथ आया हुआ। हमारे मानव शरीर में रीड की हड्डी के नीचे त्रिकोणाकार अस्थि में कुंडलिनी नामक शक्ति सुप्त अवस्था में विराजमान है। यह शक्ति हमारे जन्म के साथ हमारे अंदर विद्यमान हैं। जब यह शक्ति जागृत होती है तब हमारे मज्जा संस्था पर स्थित षट् चक्रों को पल्लवित करते हुए यह शक्ति ब्रह्मरन्ध्र का भेदन करते हुए पूरे ब्रह्मांड में फैली हुई परमेश्वरी शक्ति के साथ एकाकार हो जाती है। इसे सहज योग ध्यान पद्धति में "आत्मसाक्षात्कार" कहते हैं। जो भगवान गौतम बुद्ध को कई सदियों पहले बोधि वृक्ष के नीचे आत्मसात हुआ था।
आत्मसाक्षात्कार पाने के बाद व्यक्ति में सकारात्मक बदलाव आते हैं। कुछ समय के नियमित ध्यान और अभ्यास के बाद हम एक समग्र व्यक्तित्व पा सकते हैं।
श्री कृष्ण ने इसी आत्म साक्षात्कार को अलग - अलग तरीके से लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की। जब गोपियां यमुना नदी का पानी गगरी में भरकर और सिर पर रखकर चलती थी तब वे अपने युक्ति से इन गागरियों को कंकड़ से छेद कर देते थे। चैतन्यित जल गिरने से गोपियों को आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होता था। श्री कृष्ण को लीलाधर भी कहते हैं। उन्होंने सरल सीधे गोप - गोपियों का राधा जी के साथ रास रचाया। "रा" का अर्थ है "शक्ति" "धा" यानी "धारण करने वाली।" राधाजी के साथ हंसते, खेलते, नाचते, गाते सारे गोप गोपियां चैतन्य मय हो जाते थे। लीला यानी "खेल"। श्री कृष्ण ने सारे संसार को एक नाटक की भांति देखने का मार्गदर्शन दिया। बिना उलझे साक्षी भाव में अपने जीवन को मस्ती में जीने की सीख श्रीकृष्ण ने हीं हमें दी। भाई और बहन के पवित्र रिश्ते की नीव भगवान श्री कृष्ण ने अपनी बहन विष्णुमाया और उनके पवित्र संबंध के आशीर्वाद से प्रस्थापित की।
बिरज का बांका हमें अपनी गगरियों को संभालने की सीख देता है। लेकिन आज के दौर में हमारी गगरियां भौतिक चीजें, षड् रिपुओं मानसिक, शारीरिक, संसारिक परेशानियों से भर गई है। क्यों ना आने वाले जन्माष्टमी पर हमारी इस गगरी को कुंडलनी जागरण से छेदन करें। अपने ब्रह्मरंध्र को लांघते हुए उस परमेश्वरी शक्ति से एकाकार हों, जिसने हमें निर्माण किया हैं। आइए, बृज के बांके का संदेश हम सहजयोग आत्मसाक्षात्कार द्वारा आत्मसात करें।
इससे जानने व अनुभव करने के लिए सहज योग से जुड़े।
लर्निंग सहज योगा यूट्यूब चैनल प्रति शनिवार शाम 6:30 बजे देखकर घर बैठे सहज योग ध्यान सीख सकते हैं। नजदीकी सहज योग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 या वेबसाइट www.sahajayoga.org.in से प्राप्त करें।