
पुराणों में भी इस बात का उल्लेख है कि जब संतान श्राद्ध करती है तो माता-पिता व पूर्वजों को शांति प्राप्त होती है. पर श्राद्ध के कई नियम भी बताए गए हैं.
पूर्वजों का श्राद्ध करने का पहला अधिकार घर के बड़े पुत्र का होता है. शादी के बाद वो अपनी पत्नी संग मिलकर श्राद्ध कर सकता है. अगर किसी कारण से बड़े बेटे की उपस्थित ना हो तब छोटा पुत्र श्राद्ध करता है.
अगर परिवार एक साथ रहता है, तो बड़ा बेटा ही श्राद्ध करता है. सभी रस्में वही निभाता है. अगर परिवार अलग-अलग रहते हैं तो ऐसे में सभी भाई भी अलग -अलग श्राद्ध कर सकते हैं.
अगर किसी का पुत्र नहीं है तो उसका भाई या परिवार का अन्य बेटा उसके नाम का श्राद्ध कर सकता है. अविवाहित पुरुष या महिला का श्राद्ध भी उसके परिवार का अन्य सदस्य कर सकता है.
श्राद्ध करने का जितना हक बेटे का होता है उतना ही उसकी पत्नी का भी होता है.
बेटे के बाद पोता, परपोता अपने पूर्वजों का श्राद्ध करता है. पूर्वजों का श्राद्ध कर्म एक साथ किया जाता है. भाई-भतीजे भी श्राद्ध कर्म कर सकते हैं.
अगर किसी की केवल पुत्री है तो उसका पुत्र भी श्राद्ध कर सकता है. बेटे को मातृकुल के पितरों का श्राद्ध करने का अधिकार भी होता है...........
पुत्र ही नहीं पुत्र बधु भी कर सकती हैं श्राद्ध
===========================
श्राद्ध पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता अभिव्यक्त करने तथा उन्हें याद करने के लिए किया जाता है। यह पूर्वजों के प्रति सम्मान होता है। मान्यता है कि इसी से पितृ ऋण भी चुकता होता है। श्राद्ध कर्म से पितृगण के साथ देवता भी तृप्त होते हैं श्राद्ध के बारे में अक्सर ये कहा और सुना जाता है कि केवल पुत्र ही श्राद्ध कर सकता है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि पुत्र_न_हों_तो_पुत्री भी श्राद्ध कर सकती हैं इसका प्रमाण धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है।
आइए जानते हैं..
१:-वाल्मीक रामायण में मिलता है ऐसा प्रमाण_:- श्राद्ध कर्म पुत्रियां भी कर सकती हैं इस संबंध में वाल्मीकि रामायण में उदाहरण मिलता है, वनवास के दौरान जब श्रीराम भगवान, लक्ष्मण और माता सीता के साथ पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गयाधाम पहुंचे तो श्राद्ध के लिए कुछ सामग्री लेने के लिए नगर की ओर गए। उसी दौरान आकाशवाणी हुई कि पिंडदान का समय निकला जा रहा है। इसी के साथ माता सीता को दशरथ जी महाराज की आत्मा के दर्शन हुए, जो उनसे पिंड दान के लिए कह रही थी। इसके बाद माता सीता ने फाल्गू नदी वटवृक्ष, केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर फाल्गू नदी के किनारे श्री दशरथ जी महाराज का पिंडदान कर दिया। इससे उनकी आत्मा प्रसन्न होकर सीता जी को आर्शीवाद देकर चली गई।
२:पुराणो के_श्लोक_में_मिलता_है_ऐसा वर्णन:- पुत्रियां भी श्राद्ध कर सकती हैं इस संबंध में गरुड़ पुराण में भी वर्णन मिलता है। इसमें श्लोक संख्या 11, 12, 13 और 14 में इसका जिक्र किया गया है कि कौन-कौन श्राद्ध कर सकता है।
श्लोक :पुत्राभावे वधु कूर्यात भार्याभावे च सोदन शिष्यों वा ब्राह्म्णः सपिण्डो वा समाचरेत ज्येष्ठस वा.!
कनिष्ठस्य भ्रातृपुत्रश् पौत्रके श्राध्यामात्रदिकम कार्य पुत्रहीनेतखग.!!
अर्थ:- इस श्लोक के मुताबिक ज्येष्ठ या कनिष्ठ पुत्र के अभाव में बहू, पत्नी को श्राद्ध करने का अधिकार है। इसमें ज्येष्ठ पुत्री या एक मात्र पुत्री भी शामिल है। यदि पत्नी जीवित न हो तो सगा भाई या भतीजा, भांजा, नाती, पोता भी श्राद्ध कर सकते हैं। इन सबके अभाव में शिष्य, मित्र, कोई रिश्तेदार या फिर कुलपुरोहित मृतक का श्राद्ध कर सकता है। यानी कि परिवार के पुरुष सदस्य के अभाव में कोई भी सदस्य पितरों का श्राद्ध तर्पण कर सकता है..!!
गयाजी में किस बेटे को श्राद्ध करने का हैं अधिकार, जानें पुत्र न होने पर कौन होगा श्राद्ध का अधिकारी
हिन्दू धर्म के मरणोपरांत संस्कारों को पूरा करने के लिए पुत्र का प्रमुख स्थान माना गया है. शास्त्रों में लिखा है कि नरक से मुक्ति पुत्र द्वारा ही मिलती है. इसलिए पुत्र को ही श्राद्ध करना चाहिए...
पितृपक्ष यानि श्राद्ध का पक्ष चल रहा है. श्राद्धपक्ष 10 सितंबर 2022 से शुरू हो गया है और यह 25 सितंबर तक चलेगा. हमारे परिजन अपनी देह का त्याग कर इस दुनिया से प्रस्थान हो जाते हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए पितृपक्ष के इन दिनों में श्राद्ध-तर्पण कर्म किये जायेंगे. लेकिन इस दौरान पितर की श्राद्ध तिथि के दिन शास्त्रों में कुछ नियमों का पालन करना भी जरूरी माना गया है. पितृपक्ष में पितरों का श्राद्ध कौन कर सकता है. जिससे श्राद्ध का उद्देश्य पूरा हो सके. किसके निमित्त कौन कर सकता है.
गयाजी में किस बेटे को श्राद्ध करने का हैं अधिकार
हिन्दू धर्म के मरणोपरांत संस्कारों को पूरा करने के लिए पुत्र का प्रमुख स्थान माना गया है. शास्त्रों में लिखा है कि नरक से मुक्ति पुत्र द्वारा ही मिलती है. इसलिए पुत्र को ही श्राद्ध, पिंडदान का अधिकारी माना गया है. पितृपक्ष में पितर को नरक से रक्षा करने वाले पुत्र की कामना हर मनुष्य करता है.
इसलिए यहां जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार पुत्र न होने पर कौन-कौन श्राद्ध का अधिकारी हो सकता है. आइए जानते है
जानें कौन कर सकता है श्राद्ध
पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए
पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है.
पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में संपिंडों को श्राद्ध करना चाहिए.
एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करता है.
पुत्री का पति एवं पुत्री का पुत्र भी श्राद्ध के अधिकारी हैं.
पुत्र के न होने पर पौत्र या प्रपौत्र भी श्राद्ध कर सकते हैं.
पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के न होने पर विधवा स्त्री श्राद्ध कर सकती है.
पत्नी का श्राद्ध तभी कर सकता है, जब कोई पुत्र न हो.
पुत्र, पौत्र या पुत्री का पुत्र न होने पर भतीजा भी श्राद्ध कर सकता है.
गोद में लिया पुत्र भी श्राद्ध का अधिकारी है.
कोई न होने पर राजा को उसके धन से श्राद्ध करने का विधान है.