
12 Oct 2022
करवा चौथ पर इस बार चंद्रमा के उच्च राशि में होने और रोहिणी नक्षत्र से बनेगा दुर्लभ संयोग
इस साल 2022 का करवा चौथ बेहद खास होने वाला है. ज्योतिष के अनुसार इस बार करवा चौथ पर दुर्लभ व शुभ योग बन रहा है, जिसमें पूजा करने पर व्रती महिलाओं को खूब लाभ मिलेगा. करवा चौथ के दिन ही चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृष में रहेंगे.
इस साल करवा चौथ पर अपनी उच्च राशि वृष में रहेंगे चंद्रमा.
करवा चौथ पर चंद्रमा का उच्च राशि और रोहिणी नक्षत्र का दुर्लभ योग.
इस साल दुर्लभ योग में होगी करवा चौथ की पूजा मिलेगा दोगुना फल.
करवा चौथ का व्रत हर साल कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है. सुहागिन स्त्रियों के लिए करवा चौथ का व्रत महत्वपूर्ण कहा जाता है. करवा चौथ के दिन महिलाएं सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखकर पति की दीर्घायु की कामना करती हैं. इस साल करवा चौथ का व्रत और पूजन गुरुवार 13 अक्टूबर 2022 को किया जाएगा. कहा जाता है कि इस दिन किए गए पूजा और व्रत से सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है. करवा चौथ पर चंद्रमा पूजन का भी विशेष महत्व होता है. चंद्रोदय के बाद महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पति के हाथ से जल ग्रहण कर व्रत खोलती हैं.इस साल करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास होने वाला है.
क्योंकि इस साल करवा चौथ पर दुर्लभ संयोग का निर्माण हो रहा है.
ज्योतिषाचार्य के अनुसार इस शुभ मुहूर्त और दुर्लभ योग में पूजा करने से व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होगा. आचार्य सतीश नागर जी से जानते हैं करवा चौथ का शुभ मुहूर्त और शुभ संयोग के बारे में.
करवा चौथ तिथि व मुहूर्तकार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 12 अक्टूबर रात्रि 2:00 बजे से शुरू होगा.जोकि अगले दिन 13 अक्टूबर की मध्य रात्रि 3:09 पर समाप्त होगा.उदयातिथि के अनुसार करवा चौथ का व्रत 13 अक्टूबर को रखा जाएगा.13 अक्टूबर को कृतिका नक्षत्र में शाम 6:41 तक रहेगा और इसके बाद रोहिणी नक्षत्र की शुरुआत होगी. करवा चौथ की पूजा के लिए शाम 06:01 से 07:15 तक का समय सबसे शुभ रहेगा.
करवा चौथ पर बनेगा दुर्लभ संयोग
इस साल करवा चौथ पर दुर्लभ संयोग बन रहा है. 13 अक्टूबर करवा चौथ के दिन सिद्धि योग के साथ कृतिका और रोहिणी नक्षत्र भी रहेगा. जिसे ज्योतिष के अनुसार बहुत शुभ माना जा रहा है. साथ ही इस बार करवा चौथ पर चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृष में रहेंगे. चंद्रमा के उच्च राशि में होने और रोहिणी नक्षत्र के संयोग से इस साल का करवा चौथ सुहागिनों के लिए विशेष फलदायी होगा.
करवा चौथ पर करें इन नियमों का पालन
करवा चौथ के दिन अपने सुहाग का सामान किसी अन्य स्त्री को भूलकर भी न दें.
हालांकि करवा चौथ पर सुहाग के नए सामान को दान करना अच्छा माना जाता है.
सरगी और भगवान की पूजा करने के बाद ही करवा चौथ के निर्जला व्रत का संकल्प लें.
करवा चौथ व्रत में दिन के समय नहीं सोना चाहिए.
इस दिन काले, सफेद, ग्रे, ब्लू या ब्राउन रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए.
व्रती महिला को करवा चौथ के दिन वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए.
करवा चौथ पर बना है यह शुभ संयोग, इस समय चंद्रमा की पूजा करना होगा बेहद शुभ फलदायी
करवाचौथ का व्रत कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाएगा। इस साल करवाचौथ का व्रत 13 अक्टूबर को रखा जाएगा। इस बार करवाचौथ पर बहुत ही शुभ संयोग बन रहा है।
तो आइए जानते हैं करवाचौथ की पूजा करना किस समय रहेगा सबसे ज्यादा शुभ फलदायी।
करवाचौथ कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस साल करवाचौथ का व्रत 13 अक्टूबर दिन गुरुवार को रखा जाएगा। करवाचौथ पर इस बार बेहद ही शुभ संयोग बन रहा है। इस दौरान यदि चंद्रमा की पूजा की जाए तो दांपत्य जीवन के लिए बेहद शुभ फलदायी साबित होगा। करवाचौथ का व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए रखती है और कुंवारी कन्या मन अनुकूल जीवनसाथी पाने के लिए इस व्रत को करती हैं। इस व्रत में मां पार्वती, भगवान शिव और गणेशजी की पूजा की जाती है।
आइए जानते हैं करवाचौथ पर किस समय चंद्रमा की पूजा करना रहेगा बेहद शुभ फलदायी।
करवा चौथ 2022की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त
रोहिणी नक्षत्र में चंद्रमा की पूजा करना बेहद शुभ फलदायी माना जाता है। करवाचौथ के दिन शाम में रोहिणी नक्षत्र 6 बजकर 41 मिनट पर लग रहा है तो ऐसे में इस समय के बाद पूजा करना लाभकारी रहेगा। दरअसल, रोहिणी चंद्रमा की सबसे प्रिय पत्नी हैं। चौथ तिथि का आरंभ 12 अक्टूबर को रात में 2 बजे से चतुर्थी तिथि का आरंभ होगा और 13 तारीख में मध्य रात्रि 3 बजकर 09 मिनट पर समाप्त होगी।
करवा चौथ 2022 पर बना है बेहद शुभ संयोग
करवाचौथ पर सिद्धी योग बन रहा है।इसी के साथ दिन का आरंभ सर्वार्थ सिद्धि योग से हो रहा है। इस दिन शुक्र और बुध दोनों एक राशि यानी कन्या राशि में रहेंगे इसलिए इस दिन लक्ष्मी नारायण योग बनेगा।इसके अलावा बुध और सूर्य भी एक साथ हैं जिस वजह से बुध आदित्य योग भी इस दिन बन रहा है।वहीं,शनि अपनी राशि मकर में होंगे और गुरु मीन राशि में होंगे,गुरु मीन राशि में और बुध अपनी राशि कन्या में रहेंगे।तीनों ग्रह अपनी स्वराशि में रहेंगे और इस दिन चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में रहेंगे।यह सभी मिलकर बहुत ही शुभ संयोग बना रहे हैं।
करवा चौथ 2022 की मान्यता
करवाचौथ का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन ,सुहागिन महिलाएं सौलह श्रृंगार कर अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर शिव परिवार के साथ साथ करवा माता की पूजा उपासना करती हैं और उनसे अपनी पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।
करवा चौथ 13 अक्टूबर विशेष
करवा चौथ व्रत का हिन्दू संस्कृति में विशेष महत्त्व है। इस दिन पति की लम्बी उम्र के लिए पत्नियां पूर्ण श्रद्धा से निर्जला व्रत रखती है।
सुहागन महिलाओं के लिए चौथ महत्वपूर्ण है। इसलिए इस दिन पति की लंबी उम्र के साथ संतान सुख की मनोकामना भी पूर्ण हो सकती है।
करवा चौथ का मुहूर्त
करवा चौथ का महत्व
छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इससे जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता है। साथ ही साथ इससे लंबी और पूर्ण आयु की प्राप्ति होती है। करवा चौथ के व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणेश तथा चंद्रमा का पूजन करना चाहिए। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अघ्र्य देकर पूजा होती है। पूजा के बाद मिट्टी के करवे में चावल,उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री रखकर सास अथवा सास के समकक्ष किसी सुहागिन के पांव छूकर सुहाग सामग्री भेंट करनी चाहिए।
महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। वह कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करें तो इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है। द्रौपदी विधि विधान सहित करवाचौथ का व्रत रखती है जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार की कथाओं से करवा चौथ का महत्त्व हम सबके सामने आ जाता है।
महत्त्व के बाद बात आती है कि करवा चौथ की पूजा विधि क्या है? किसी भी व्रत में पूजन विधि का बहुत महत्त्व होता है। अगर सही विधि पूर्वक पूजा नहीं की जाती है तो इससे पूरा फल प्राप्त नहीं हो पाता है।
चौथ की पूजन सामग्री और व्रत की विधि
विस्तार से
करवा चौथ पर्व की पूजन सामग्री
कुंकुम, शहद, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मेंहदी, मिठाई, गंगाजल, चंदन, चावल, सिन्दूर, मेंहदी, महावर, कंघा, बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, मिट्टी का टोंटीदार करवा व ढक्कन, दीपक, रुई, कपूर, गेहूँ, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, छलनी, आठ पूरियों की अठावरी, हलुआ, दक्षिणा के लिए पैसे।
सम्पूर्ण सामग्री को एक दिन पहले ही एकत्रित कर लें।
व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहन लें तथा शृंगार भी कर लें। इस अवसर पर करवा की पूजा-आराधना कर उसके साथ शिव-पार्वती की पूजा का विधान है क्योंकि माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके शिवजी को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था इसलिए शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा का धार्मिक और ज्योतिष दोनों ही दृष्टि से महत्व है। व्रत के दिन प्रात: स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोल कर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें।
करवा चौथ पूजन विधि
प्रात: काल में नित्यकर्म से निवृ्त होकर संकल्प लें और व्रत आरंभ करें।
व्रत के दिन निर्जला रहे यानि जलपान ना करें।
व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें-
प्रातः पूजा के समय इस मन्त्र के जप से व्रत प्रारंभ किया जाता है-
मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये
अथवा👇
ॐ शिवायै नमः' से पार्वती का,
'ॐ नमः शिवाय' से शिव का,
'ॐ षण्मुखाय नमः' से स्वामी कार्तिकेय का, 'ॐ गणेशाय नमः' से गणेश का तथा
'ॐ सोमाय नमः' से चंद्रमा का पूजन करें।
शाम के समय, माँ पार्वती की प्रतिमा की गोद में श्रीगणेश को विराजमान कर उन्हें बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी अथवा लकड़ी के आसार पर शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा की स्थापना करें। मूर्ति के अभाव में सुपारी पर नाड़ा बाँधकर देवता की भावना करके स्थापित करें। पश्चात माँ पार्वती का सुहाग सामग्री आदि से श्रृंगार करें।
भगवान शिव और माँ पार्वती की आराधना करें और कोरे करवे में पानी भरकर पूजा करें। एक लोटा, एक वस्त्र व एक विशेष करवा दक्षिणा के रूप में अर्पित करें।
सौभाग्यवती स्त्रियां पूरे दिन का व्रत कर व्रत की कथा का श्रवण करें। चंद्रोदय के बाद चाँद को अर्घ्य देकर अपने पति के हाथ से जल एवं मिष्ठान खा कर व्रत खोले।
करवा चौथ व्रत कथाऐं
करवा चौथ प्रथम कथा
बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी।
शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।
सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो।
इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्य देकर खाना खाने बैठ जाती है।
वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है।
उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।
सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।
एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।
इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है।
सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है।
अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।
करवाचौथ द्वितीय कथा
इस कथा का सार यह है कि शाकप्रस्थपुर वेदधर्मा ब्राह्मण की विवाहिता पुत्री वीरवती ने करवा चौथ का व्रत किया था। नियमानुसार उसे चंद्रोदय के बाद भोजन करना था, परंतु उससे भूख नहीं सही गई और वह व्याकुल हो उठी। उसके भाइयों से अपनी बहन की व्याकुलता देखी नहीं गई और उन्होंने पीपल की आड़ में आतिशबाजी का सुंदर प्रकाश फैलाकर चंद्रोदय दिखा दिया और वीरवती को भोजन करा दिया।
परिणाम यह हुआ कि उसका पति तत्काल अदृश्य हो गया। अधीर वीरवती ने बारह महीने तक प्रत्येक चतुर्थी को व्रत रखा और करवा चौथ के दिन उसकी तपस्या से उसका पति पुनः प्राप्त हो गया।
करवा चौथ तृतीय कथा
एक समय की बात है कि एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गाँव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया। स्नान करते समय वहाँ एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा।
उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई और आकर मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया। मगर को बाँधकर यमराज के यहाँ पहुँची और यमराज से कहने लगी- हे भगवन! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। उस मगर को पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में ले जाओ।
यमराज बोले- अभी मगर की आयु शेष है, अतः मैं उसे नहीं मार सकता। इस पर करवा बोली, अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूँगी। सुनकर यमराज डर गए और उस पतिव्रता करवा के साथ आकर मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी। हे करवा माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।
करवाचौथ चौथी कथा
एक बार पांडु पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी नामक पर्वत पर गए। इधर द्रोपदी बहुत परेशान थीं। उनकी कोई खबर न मिलने पर उन्होंने कृष्ण भगवान का ध्यान किया और अपनी चिंता व्यक्त की। कृष्ण भगवान ने कहा- बहना, इसी तरह का प्रश्न एक बार माता पार्वती ने शंकरजी से किया था।
पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्य देकर फिर भोजन ग्रहण किया जाता है। सोने, चाँदी या मिट्टी के करवे का आपस में आदान-प्रदान किया जाता है, जो आपसी प्रेम-भाव को बढ़ाता है। पूजन करने के बाद महिलाएँ अपने सास-ससुर एवं बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेती हैं।
तब शंकरजी ने माता पार्वती को करवा चौथ का व्रत बतलाया। इस व्रत को करने से स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा हर आने वाले संकट से वैसे ही कर सकती हैं जैसे एक ब्राह्मण ने की थी। प्राचीनकाल में एक ब्राह्मण था। उसके चार लड़के एवं एक गुणवती लड़की थी।
एक बार लड़की मायके में थी, तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। कुछ खाया-पीया नहीं, पर उसके चारों भाई परेशान थे कि बहन को प्यास लगी होगी, भूख लगी होगी, पर बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी।
भाइयों से न रहा गया, उन्होंने शाम होते ही बहन को बनावटी चंद्रोदय दिखा दिया। एक भाई पीपल की पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर छलनी से रोशनी उत्पन्न कर दी। तभी दूसरे भाई ने नीचे से बहन को आवाज दी- देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहण करो। बहन ने भोजन ग्रहण किया।
भोजन ग्रहण करते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। अब वह दुःखी हो विलाप करने लगी, तभी वहाँ से रानी इंद्राणी निकल रही थीं। उनसे उसका दुःख न देखा गया। ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए और अपने दुःख का कारण पूछा, तब इंद्राणी ने बताया- तूने बिना चंद्र दर्शन किए करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया इसलिए यह कष्ट मिला।
अब तू वर्ष भर की चौथ का व्रत नियमपूर्वक करना तो तेरा पति जीवित हो जाएगा। उसने इंद्राणी के कहे अनुसार चौथ व्रत किया तो पुनः सौभाग्यवती हो गई। इसलिए प्रत्येक स्त्री को अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करना चाहिए। द्रोपदी ने यह व्रत किया और अर्जुन सकुशल मनोवांछित फल प्राप्त कर वापस लौट आए। तभी से हिन्दू महिलाएँ अपने अखंड सुहाग के लिए करवा चौथ व्रत करती हैं।
सायं काल में चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही पति द्वारा अन्न एवं जल ग्रहण करें।
पति, सास-ससुर सब का आशीर्वाद लेकर व्रत को समाप्त करें।
🙏🏻🙏🏻
पूजा एवं चन्द्र को अर्घ्य देने का मुहूर्त
13 अक्टूबर के दिन चंद्रोदय का समय
7:57 मिनट पर होगा।
पूर्ण राष्ट्र में
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार करवा चौथ के दिन शाम के समय चन्द्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोला जाता है।
सभी महिला शक्ति को करवा चौथ की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं आप का सुहाग सदा सदा के लिए बना रहे
राशि के अनुसार साड़ी पहनकर करें करवा चौथ की पूजा, ये स्त्रियां नहीं रख सकतीं व्रत
13 अक्टूबर 2022 को शादीशुदा महिलाओं का महत्वपूर्ण त्योहार करवा चौथ का व्रत रखा जाएगा।
करवाचौथ का व्रत रखकर महिलाएं पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। ये व्रत महिलाओं के लिए सौभाग्यदायी भी माना गया है।
हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर हर वर्ष करवा चौथ का त्योहार मनाया जाता है। स्त्रियों के परम सौभाग्य का व्रत करक चतुर्थी या करवा चौथ गुरुवार 13 अक्टूबर को है। यह त्योहार ज्यादातर उत्तर भारत के राज्यों में विशेष रूप से बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस व्रत में महिलाएं दिन भर निर्जल रह कर शाम को करवा चौथ व्रत की कथा सुनती हैं और रात्रि में चंद्र देव के दर्शन के बाद ही व्रत खोलती हैं।
कब है करवा चौथ का व्रत
इस बार शुक्र के अस्त होने और चतुर्थी तिथि को लेकर करवा चौथ व्रत की तारीख में मतभेद है। कुछ ज्योतिषाचार्य करवा चौथ को 13 तो कुछ 14 अक्टूबर को मनाने की बात कह रहे हैं। श्री अन्नपूर्णा अनुष्ठान केंद्र के अनुसार हिंदू धर्म में कोई भी व्रत-त्योहार उदया तिथि के आधार पर ही निर्धारित की जाती है। इस कारण से इस साल करवा चौथ का व्रत 13 अक्टूबर 2022 को ही मनाया जाएगा। चंद्र दर्शन का समय रात्रि के 07:53 बजे है।
आप भी अपनी राशि के अनुसार साड़ी पहनकर करें पूजा
श्री अन्नपूर्णा अनुष्ठान केंद्र के आचार्य पंडित सतीश नागर ने बताया कि विशेष फल प्राप्ति के लिए महिलाएं राशि के अनुसार साड़ी पहनें तो विशेष फल की प्राप्ति होगी। उन्होंने बताया कि राशि के अनुसार पुष्प भी अर्पित करें।
मेष : इस राशि की महिलाएं गहरे लाल रंग की साड़ी पहनें, लाल गुड़हल या गुलाब अर्पित करें।
बृषभ : पीली साड़ी धारण करें, पीले गेंदे का पुष्प चढ़ाएं।
मिथुन : हल्के हरे रंग की साड़ी पहनकर पूजन करें और पत्ती युक्त फूल से पूजन करें।
कर्क : गुलाबी वस्त्र उत्तम रहेगा, सफेद फूल या चावल चढ़ाएं।
सिंह : लाल साड़ी धारण करें और लाल फूल अर्पित करें।
कन्या : हरी धारी वाली साड़ी पहनकर और पत्ती युक्त पुष्प से पूजन करें।
तुला : सफेद धारी या कढ़ाई वाली गुलाबी साड़ी और सफेद रंग का फूल से पूजन करें।
कुम्भ : नीले रंग की साड़ी और नील कमल चढ़ाएं।
मीन : पीली साड़ी धारण करें और पीले या गुलाबी पुष्प से पूजन करें।
किन स्त्रियों को नहीं रखना है व्रत
जिन स्त्रियों को पहली बार रहना है, वे इस व्रत को नहीं रहेंगी। पण्डित सतीश नागर ने निर्णय सिन्धु का उद्धारण देकर बताया कि 'अस्तगे च गुरौ शुक्रे उद्यापनमुपारम्भभम् व्रतानम् नैव कारयेत।' अर्थात् शुक्रस्त होने के बाद व्रत का आरम्भ या उद्यापन नहीं करते हैं।