
शास्त्रों में गुरु का स्थान सर्वोच्च बताया गया है। देवी-देवताओं के अवतारों ने भी गुरु से ही ज्ञान प्राप्त किया। रामायण और महाभारत में कई गुरु बताए गए हैं। श्रीराम ने वशिष्ठ और विश्वामित्र से ज्ञान प्राप्त किया था। भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के गुरु महर्षि सांदीपनि थे। सांदीपनि ने ही श्रीकृष्ण को 64 कलाओं की शिक्षा दी थी।
गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते । अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः ।। – श्री गुरुगीता
अर्थ : ‘गु’ अर्थात अंधकार अथवा अज्ञान एवं ‘रु’ अर्थात तेज, प्रकाश अथवा ज्ञान। इस बात में कोई संदेह नहीं कि गुरु ही ब्रह्म हैं जो अज्ञान के अंधकार को दूर करते हैं। इससे ज्ञात होगा कि साधक के जीवन में गुरु का महत्त्व अनन्य है। इसलिए गुरु प्राप्ति ही साधक का प्रथम ध्येय है। गुरु प्राप्ति से ही ईश्वर प्राप्ति होती है अथवा यूं कहें कि गुरु प्राप्ति होना ही ईश्वर प्राप्ति है, ईश्वर प्राप्ति अर्थात मोक्ष प्राप्ति - मोक्ष प्राप्ति अर्थात निरंतर आनंदावस्था। गुरु हमें इस अवस्था तक पहुंचाते हैं । शिष्य को जीवन मुक्त करने वाले गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए गुरुपूर्णिमा मनाई जाती है।
गुरु पूर्णिमा की कथा ऋषि व्यास के जन्म से जुड़ी है, जिन्हें हिंदू पौराणिक कथाओं में सबसे महान गुरुओं में से एक माना जाता है। ऋषि व्यास का जन्म इसी शुभ दिन पर हुआ था। उन्होंने वेदों को चार भागों में विभाजित किया था। गुरु पूर्णिमा ऋषि व्यास के आध्यात्मिक और साहित्यिक ज्ञान में उनके योगदान के रूप में मनाया जाता है।
गुरु पूर्णिमा हिंदू कैलेंडर के अनुसार, आषाढ़ महीने की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस बार गुरु पूर्णिमा 3 जुलाई को मनाई जाएगी। इस बार गुरु पूर्णिमा 2 जुलाई को रात 08:20 बजे शुरू होगी और 3 जुलाई को शाम 05:08 बजे समाप्त होगी।