
रक्षाबंधन भाई बहन की प्रेम का प्रतीक है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई में राखी बांधकर भाई की लंबी उम्र की कामना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है। रक्षाबंधन में बहन शुभ मुहूर्त में भाई की कलाई में राखी बांधती हैं। रक्षाबंधन के दिन भद्रा काल में राखी नहीं बंधवाई जाती है, भद्रा काल का समय अशुभ माना जाता है।
इसके पीछे की वजह रावण से जुड़ी एक कथा में छिपी हुई है।
भद्रा में राखी न बांधने का कारण
पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि शूर्पणखा ने अपने भाई रावण को भद्रा काल में ही राखी बांधी थी, जिसके कारण रावण का कुल समेत विनाश हो गया, यानी कि रावण का अहित हुआ। इस कारण मना किया जाता है कि भद्राकाल में राखी नहीं बांधनी चाहिए। वहीं यह भी कहा जाता है कि भद्रा के वक्त भगवान शिव तांडव करते हैं और वो काफी क्रोध में होते हैं, ऐसे में अगर उस समय कुछ भी शुभ काम करें तो उसे शिव जी के गुस्से का सामना करना पड़ेगा और अच्छा काम भी बिगड़ जायेगा इसलिए भद्रा के समय कोई भी शुभ काम नहीं होता।
कौन है भद्रा?
शास्त्रों के अनुसार, भद्रा सूर्यदेव की बेटी और ग्रहों के सेनापति शनिदेव की बहन है. शनि की तरह इनका स्वभाव भी कठोर माना जाता है. इनके स्वभाव को समझने के लिए ब्रह्मा जी ने काल गणना या पंचांग में एक विशेष स्थान दिया है. भद्रा के साए में शुभ या मांगलिक कार्य, यात्रा और निर्माण कार्य निषेध माने गए हैं. श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर जब भद्रा का साया रहता है, तब भाई की कलाई पर राखी नहीं बांधी जाती है|
हिंदू पंचांग के कुल 5 प्रमुख अंग होते हैं - तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण
इसमें करण का विशेष स्थान होता है*जिसकी संख्या 11 होती है| 11 करणों में से 7वें करण विष्टि का नाम ही भद्रा है| भद्रा के साए में शुभ कार्य करने से लोग डरते हैं| ऐसा कहते हैं कि लंकापति रावण की बहन सूर्पनखा ने भद्रा के साए में ही उसे राखी बांधी थी और इसके बाद उसके साम्राज्य का विनाश हो गया था|
कब रहता है भद्रा का अशुभ प्रभाव?
ज्योतिष के जानकारों का कहना है कि भद्रा अलग-अलग राशियों में रहकर तीनों लोकों का भ्रमण करती है| जब यह मृत्युलोक में होती है तो शुभ कार्यों में बाधा और सर्वनाश करने वाली होती है| भद्रा जब कर्क, सिंह, कुंभ और मीन राशि में रहती तो भद्रा विष्टी करण योग बनता है| इस दौरान भद्रा पृथ्वी लोक में ही रहती है. ऐसे में तमाम शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित हो जाते हैं|
पंडित सतीश नागर उज्जैन
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