
22 Jul 2023
स्कंदपुराण में लिखा है यज्ञ-अनुष्ठान का महत्त्व
यज्ञ एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। यह ठीक विधि विधान, अनुशासन एवं शक्ति के साथ की जानी चाहिये। यज्ञ का स्थान स्वच्छ व पवित्र होना चाहिए। दैनिक यज्ञ का समय निश्चित होना चाहिये। आयुर्वेद में गाय घी का हवन में प्रयोग करना अधिक उचित माना गया है। इसमें अधिकतम विष प्रतिरोधक शक्ति होती है। अतः घी की आहुति देने वाला चम्मच/सुवा कुछ बड़ा हो तो अच्छा है।
आम, पीपल, बरगद, . बेल, गूलर, पलाश की लकड़ी हवन के लिए उत्तम है। इनसे बहुत कम कार्बन डाई ऑक्साईड निकलती है। आवश्यकता से अधिक या मोटी समिधाएँ भी यज्ञ कुण्ड में नहीं डालनी चाहियें। समिधायें सूखी, कीट रहित, विना गांठ वाली, पवित्र व हवन कुण्ड के आकार के अनुसार होनी चाहिए। किसी भी आश्रम या बाजार से समिधाएं ले सकते हैं। घर पर हवन कुण्ड के आकार के अनुसार ( कुल्हाड़ी से ) उन्हें छोटा व पतला करके पहले से ही रख लेना चाहिये ।

तांबे के हवन कुण्ड में कीटनाशक शक्ति अधिक होती है । अतः लोहे की अपेक्षा तांबे का कुण्ड प्रयोग करना अच्छा होता है। हवन कुण्ड अधिक गहरा नहीं होना चाहिये । यज्ञ सामग्री ऋतुओं के अनुसार होने से उत्तम लाभ देती है । उच्च गुणवत्ता वाली कंपनी की यज्ञ सामग्री लें जिससे इसमें ऋतु के अनुसार अन्य सामग्री जड़ी बूटियाँ मिलाई जा सकती हैं। जलती हुई तीव्र अग्नि में ही आहुति देनी चाहिए ताकि धुंआ कम से कम हो। धुंआ कम करने के लिए अधिक घी व सूखी समिधा का प्रयोग करें हवन करते समय हवन कुण्ड में खुवा या चिमटे से हवन अग्नि को नहीं हिलाना चाहिये।
हवन करते समय यज्ञोपवीत पहनना चाहिये। श्वास प्रश्वास का भी उचित प्रयोग करना चाहिए। यज्ञ कर्म के समय मन स्थिर व शान्त रखना चाहिए। कमर,गर्दन व सिर सीधा रखना चाहिये। यज्ञ पूर्ण श्रद्धा, प्रेम व ईश्वर प्रणिधान की भावना से करना चाहिए यज्ञ करते समय गप-शप या सांसारिक बातें नहीं करनी चाहियें। यज्ञ प्रार्थना में ताली बजाना वर्जित है । यज्ञ में काम आने वाले पात्र घर में प्रयोग नहीं करने चाहियें। यज्ञ पूर्ण होने पर पुरोहित को उदारता के साथ, पर्याप्त दक्षिणा अवश्य देनी चाहिये। पर्याप्त दक्षिणा के बिना यज्ञ निष्फल माना जाता है ।

यज्ञ करते समय कुर्ता पजामा या कुर्ता धोती ही पहनना चाहिये। काले वस्त्र नहीं पहनने चाहिये। यज्ञ वेदी पर एक से अधिक यजमानों (मुख्य यजमानों के अतिरिक्त ) का बैठना अवैदिक है। यज्ञ करते समय या यज्ञ के बाद हवन कुण्ड के आस पास गिरी सामग्री को हवन कुण्ड में नहीं डालना चाहिये । हवन मन्त्रों के उच्चारण के बीच में प्रवचन करना (सलाह देना) निषेध है ।
यज्ञ प्रक्रिया में बारम्बार 'इदन्न मम' वाक्य का प्रयोग होता है। इसका अर्थ है- इसमें मेरा कुछ नहीं अर्थात् लोक-कल्याण के लिए कार्य करना । यह भावना यज्ञ का सार है। पूर्ण लाभ मन्त्र का ठीक अर्थ जानकर उसी के अनुसार आचरण करने से मिलता है. समाज सेवा करने से मिलता है, न कि मन्त्र उच्चारण मात्र से ।