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दोगलापन

12 Aug 2022

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़

अजीब दोगलापन देख रहा हूं

खुद में और समाज में,

इसे हम जता रहे

अपने कर्म और अंदाज में,

आज ही मनाया

विश्व में अपने होने का दिवस,

रात होते ही आन पड़ा

पता नहीं कौन सा विवश,

सोच रहा था कि हम सब

बुद्ध की ओर जा रहे हैं,

पर खुल कर मनुवाद को मना रहे हैं,

हमारे जीने की जड़ में प्रकृति है,

जिसकी हर जगह उपलब्ध

जीवंत आकृति है,

मिथकीय बातों से

हमारा कोई लेना देना नहीं,

जो मौजूद ही नहीं

इस जहां में कहीं,

पर उसी के पीछे भागे जा रहे हैं,

अपना सब कुछ

पाखंडों में लुटा रहे हैं,

तीन सौ चौसठ दिन के प्यार पर

एक दिन भारी हो जाता है,

आदमी अपनी जमा पूंजी

शौक से लुटाता है,

हमें नहीं भूलने चाहिए कि

पाखंड हमें वर्षों पीछे ले जाते हैं,

जो हमें कभी भी

सत्य की राह नहीं दिखाते हैं,

कोई कुछ भी कहे

हमें बुध्द की राह में जाना होगा,

सोच समझ, विज्ञान व सत्य को

खुले दिल से अपनाना होगा।

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