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जब अध्यक्ष तय है तो किस बात की लड़ाई ?

संपादकीय/मालवा हेराल्ड | आज़ादी से पूर्व नेहरू और इंदिरा की सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस पार्टी ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के लिए कार्यक्रम घोषित कर दिया है। २२ सितंबर को अधिसूचना के बाद ३० सितंबर तक कोई भी व्यक्ति नामांकन दाखिल कर सकता है। ८ अक्टूबर तक नाम वापस लिया जा सकता है। जरूरत होने पर १७ अक्टूबर को मतदान और फिर १९ अक्टूबर को मतगणना होगी। कार्यक्रम की घोषणा से प्रतीत होता है कि कांग्रेस संगठन में लोकतांत्रिक तरीके से अध्यक्ष का चुनाव होता है। यह बात अलग है कि पिछले २४ वर्षों से सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी ही कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं। मौजूदा समय में भी सोनिया गांधी ही अध्यक्ष है और गांधी परिवार से जुड़े कांग्रेसी चाहते हैं कि राहुल गांधी फिर से अध्यक्ष बन जाएं। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत तो राहुल गांधी के लिए अपनी जान भी देने को तैयार है। राहुल को मनाने के लिए हरीश रावत ने आमरण अनशन की घोषणा की है। गांधी परिवार की मेहरबानी से तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का मानना है कि राहुल गांधी ही कांग्रेस संगठन को चला सकते हैं। मौजूदा समय में जो तस्वीर उभर कर सामने आई है, उसमें राहुल गांधी का अध्यक्ष बनना तय है। यदि राहुल अपनी जिद पर कायम रहते हैं तो फिर अशोक गहलोत अध्यक्ष बनेंगे। अपने बेटे के जिद्दीपन को देखते हुए सोनिया गांधी ने भी गहलोत से कांग्रेस की कमान संभालने का आग्रह किया है। अब यह तय है कि राहुल गांधी या अशोक गहलोत ही कांग्रेस के अध्यक्ष बनेंगे। सवाल उठता है कि जब अध्यक्ष बनने वाले नेता का नाम जगजाहिर है, तब कांग्रेस में किस बात के चुनाव हो रहे हैं? क्या राहुल गांधी के नामांकन के बाद कांग्रेस का कोई भी नेता अध्यक्ष पद के लिए नामांकन कर सकता है? या फिर गांधी परिवार की मेहरबानी से नामांकन दाखिल करने वाले अशोक गहलोत को कोई असंतुष्ट नेता चुनौती दे सकता है? कांग्रेस की ओर से दावा किया गया है कि अध्यक्ष के चुनाव में देश भर के ९ हजार मतदाता भाग लेंगे। सवाल उठता है कि आखिर ये ९ हजार मतदाता कौन से हैं? सब जानते हैं कि कांग्रेस में प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र से दो नेताओं को प्रदेश प्रतिनिधि चुना जाता है। देश में ४ हजार १०० विधानसभा क्षेत्र है। ये प्रदेश प्रतिनिधि ही अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। यानी देशभर में ८ हजार २०० तो प्रदेश प्रतिनिधि ही होंगे। प्रदेश प्रतिनिधि उसी कांग्रेसी को बनाया जाता है जो प्रदेश नेतृत्व के प्रति वफादारी दिखाते हैं। कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति गांधी परिवार ही करता है। स्वाभाविक है कि अध्यक्ष पद को लेकर कांग्रेस में गांधी परिवार को कोई चुनौती नहीं है। राहुल गांधी मौजूदा समय में अध्यक्ष नहीं हैं, लेकिन संगठन के महत्वपूर्ण निर्णय राहुल ही लेते हैं। ऐसे में राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा का भी आयोजन कर रहे है,जो कि ५ माह तक चलेगी ओर देश को जोड़ने का काम करेगी पर अभी तो कॉंग्रेस पार्टी आपने मुख्य नेताओं को भी इस्तीफा स्वीकार कर उन्हें पार्टी से बाहर कर रही है जैसे गुलाम नबी आजाद और मनीष तिवारी जो कि पार्टी के बड़े नेता हैं और उनकी नजर अंदाज करना पार्टी और नवीन अध्यक्ष के लिए कितना हितकारी होगा।


विजय शर्मा

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