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कृषि भूमि किराये पर ले रहे हैं? तो रखें इन बातों का विशेष ध्यान

संपादकीय(विशेष आलेख)


यदि आप कृषि भूमि को किराये पर लेने की सोच रहे हैं तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें वरना आप धोखाधड़ी का शिकार हो सकते हैं। केवल रजिस्ट्री देख कर कृषि भूमि का सत्यापन करना उचित नहीं है, इसके लिए आपको उस भूमि की हिस्ट्री चेक करवाना जरूरी है। आज के दौर में जहाँ साइबर क्राइम अपने चरम पर है तो वहीं दूसरी ओर ज़मीन की धोखाधड़ी का काम भी अपने पैर पसार रहा है। महंगाई के इस दौर में जहाँ आम आदमी के लिए ज़मीन लेना कठिन हो गया है तो वहीं दूसरी ओर ठगों के लिए भी ज़मीन बेचना एक कठिन काम हो गया है। ज़मीन के दाम ऊँचे होने से छोटे व्यापारी ज़मीन को ख़रीद कर व्यापार करने की जगह उक्त भूमि को किराये पर लेकर व्यापार करना अधिक पसंद कर रहे हैं।


लोगों की इसी रूचि का फायदा जालसाज़ लोग उठा रहे हैं। वे ज़मीन से जुड़े कुछ कागजाद जैसे केवल रजिस्ट्री दिखा कर उक्त भूमि को किराये पर चढ़ा देते हैं। लेकिन कृषि भूमि के स्वामित्व का मुख्य प्रमाण केवल रजिस्ट्री नहीं होता इसका सत्यापन तहसील कार्यालय से होता है। कई बार देखने में आया है कि लोग कृषि भूमि को रजिस्ट्री देखकर किराये से ले लेते हैं और बाद में उन्हें पता चलता है कि उक्त ज़मीन का तो न्यायालय में प्रकरण चल रहा है। भूमि के रिकॉर्ड से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी तहसील कार्यालय में उपलब्ध रहती है, भूमि को किराये से लेने से पहले उक्त भूमि की पड़ताल बेहद जरूरी है।


आमतौर पर यह देखने में आता है कि जिस व्यक्ति की भूमि होती है अर्थात भूस्वामी स्वयं को ऊँचे कद का व्यक्ति मानता है। अपने फ़ायदे के लिए उक्त व्यक्ति कम कीमत में विवादित ज़मीन का सौदा कर लेता है किन्तु कृषि भूमि के न्यायालय में प्रकरण होने की स्तिथि में वह उसे कमर्शियल भूमि में परिवर्तित नहीं करा पता। ऐसे समय में वह उक्त विवादित भूमि से कुछ पैसे कमाने की चाहत में उसे किराये पर दे देते है। न्यायालय में प्रकरण होने के कारण वह स्वयं उस भूमि पर निर्माण ना करा कर किरायेदार को उस ज़मीन पर अस्थाई निर्माण कराने की सहमति दे देते है। चूँकि किरायेदार उक्त भूमि का ख़रीददार नहीं होता इसलिए वह कृषि भूमि के स्वामी से उक्त कागजों की डिमांड नहीं करता और यहीं उसके साथ छल होने की संभावना बढ़ जाती है।


यह तो थी कागजों को जांचने की बात; हाल ही में इन्दौर जैसे महानगर में शहर के एक प्रतिष्ठित व्यापारी ने तो हद कर दी। व्यापारी शहर के मध्य एक बड़ी होटल का निर्माण कर रहे थे, जब उन्हें इनकम दिखाने के लिए कुछ पैसों की ज़रूरत महसूस हुई तो उन्होंने अपनी कृषि भूमि किराये पर दे दी। यही नहीं कागजों पर सभी कुछ ठीक लगे इसलिए उन्होंने उस पर किरायेदार से 18% जीएसटी अलग से लिया और पूरी ईमानदारी से 10% टीडीएस भी भरवाया। उन्होंने किरायेदार से ही उक्त ज़मीन पर सम्पूर्ण निर्माण करवाया, इस प्रकार से इस सौदे में उन्हें बहुत लाभ हुआ। स्वयं की सुविधा को ध्यान में रखकर उक्त कृषि भूमि का अनुबंध भी वे 11 माह से अधिक समय का नहीं कराते थे।


यहाँ तक सब कुछ ठीक चल रहा था, भूस्वामी भी सोचते थे कि प्रकरण समाप्त होने पर उक्त अनुबंध समाप्त कर देंगे। यहाँ मज़ेदार बात ये थी कि जिस भूमि को उन्होंने अलग खसरा नंबर लिखकर किराये से दे दिया था वह किसी और की थी और भूस्वामी ने उसपर कब्ज़ा कर रखा था। यही नहीं भूस्वामी ने जिन खसरों का उल्लेख अनुबंधों में किया था वह ऋण पर दी हुई जगह से काफ़ी दूरी पर थे। सरल शब्दों में कहा जाए तो जो कृषि भूमि किराये से दी गई थी उसमें से मात्र 30% भूमि पर ही अनुबंध करने वाले का स्वामित्व था। कुछ समय जब अन्य भूमि मालिकों को इस बारे में पता चला तो उन्होंने किरायेदार से संपर्क किया और झूठा अनुबंध करने वाले की शिकायत पुलिस में कर दी।


अतः पाठकों से अनुरोध है कि यदि वे किसी और के स्वामित्व वाली कृषि भूमि को किराये से लेने की योजना बना रहे हैं तो एक बार उसके सम्पूर्ण काग़ज अवश्य जाँच लें। यदि संभव हो तो पटवारी से उक्त भूमि का नक्शा इत्यादि समझ लें। किसी अन्य व्यक्ति की भूमि को अपनी बताकर उसे बेचना अथवा किराये से देने भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध है एवं इसमें लंबी सजा का प्रावधान है।


शुभम ताम्रकार

प्रधान संपादक

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