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आज का भाव यो है ~ कल का भाव हुकुमचंद जाने

14 जुलाई 1874 को जन्मे सेठ हुकुमचंद की दास्तां


इंदौर में बड़ी~बड़ी हस्तियों ने जन्म लिया है। यहाँ की सौंधी माटी में ऐसी हस्ती भी पैदा हुई है जिसके बारे में ओशो ने तक ने लिखा है कि ये सबसे अमीर है। जिनकी अपार दौलत इंदौर रियासत तक को टक्कर देती थी। उनका नाम ही सेठ था....हुकुमचंद सेठ!!


सेठ हुकुमचन्द का जन्म 1874 में सेठ पुसाजी के परिवार में हुआ था, पुसाजी परिवार ने इंदौर में होलकर मराठा वंश की स्थापना का समर्थन किया था।


बेशक हुकुमचंद सेठ इंदौर की वो नामी गिरामी शख्सियत थी जिन्होंने बिना ब्याज के अंग्रेजों से लेकर इंदौर महाराजा तक को कर्जा दिया। इसी बात से खुश होकर तुकोजीराव महाराज ने उन्हें 1915 में राय बहादुर तो अंग्रेजों ने 1919 में 'सर' के खिताब से नवाजा।


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इसके अलावा उन्हें अपनी उपलब्धियों के लिए राय बहादुर, राज भूषण, राव राजा और राज्य रत्न से सम्मानित किया गया|


सिर्फ इतना ही नहीं अफीम और कपास के किंग हुकुमचंद सेठ ने महात्मा गांधी के इंदौर आगमन पर उन्हें अपनी कोठी पर बुलाया, शानदार दावत दी और सोने के बर्तनों में खाना परोसा। सेठ की रजामंदी से सोने की थाली गांधी जी अपने साथ ले गए। उसी वक्त आपने 40 एकड़ जमीन कस्तूरबाग्राम खोलने के लिए खंडवा रोड पर दान दी।

इंदौर के महाराजा तुकोजीराव होलकर इन्हें बहुत चाहते थे। अक्सर शाम इनकी कोठी पर गुजारते और दरबार में अपने पास वाली कुर्सी पर बैठाते। इंदौर के आखरी महाराज श्रीमंत यशवंत राव होलकर से भी यही ताल्लुकात थे।


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तोपखाने में आपकी आदमकद मूर्ति लगी है, आपके नाम से इंदौर में हुकुमचंद मार्ग भी है।


इसी मार्ग पर महलनुमा कांच मंदिर जो हमें शीश महल की याद दिलाता है उन्होंने ही बनवाया। पलासिया पर एक से एक खूबसूरत जैन मंदिर आपकी ही देन है। जितना खर्चा आपने अपने रहने के लिए इंद्र भवन में किया उतना ही खर्चा जैन मंदिरों की तामीर में किया। इनके ठाठ-बाठ भी राजाओं जैसे थे, गले में जेवरात और कीमती मालाएं डालते थे। इनके गैराज में सोने की रॉयल रोल्स कार थी।


एक मर्तबा महावीर जी की रथयात्रा के लिए भी इन्होंने सोने का रथ दान कर दिया। बुजुर्ग हुए तब कुबड़ी (लाठी) इनके हाथों में होती थी। आजादी से पहले इनकी टक्कर टाटा और बिरला जैसे बिजनेस मैन से रही। इन्होंने ही 1917 में कलकत्ता में भारत की पहली जुट (टाट) मिल खोली। इंदौर में इनकी तीन मिले थी। कल्याणमल , राजकुमार और हुकुमचंद मिल के मालिक थे हुकुमचंद सेठ।


इंदौर अफीम और कपास का गढ़ था


काला सोना (अफीम), सफेद सोना (कपास) के किंग थे। इसी का कारोबार था। बंबई , कलकत्ता से लेकर लंदन के स्टॉक एक्सचेंज में हुकुमचंद की तूती बोलती थी। दुनिया के नामी गिरामी सटोरिए (ट्रेडर) थे हुकुमचंद सेठ।

इनके इशारे से ही कॉटन के रेट ऊपर नीचे होते थे। जिस कंपनी के शेयर खरीदते सारे सटोरिए , इन्वेस्टमेंट वही शेयर खरीद लेते। किस्मत भी ऐसी कि इनके खरीदे शेयर के भाव आसमान छू जाते।


इंदौरियो के लिए गौरव की बात है कि लंदन के स्टॉक बाजार में आपकी तस्वीर लगी है जो इस बात की निशानी है आप सिर्फ काटन किंग नहीं बल्कि शेयर किंग भी थे। तभी तो उस जमाने में ये कहावत चल पड़ी.....

"आज का भाव यो है~कल का भाव हुकुमचंद जाने"


इंदौर में जब-जब मुसीबत पड़ी


आपने दिल खोलकर मदद की। 1899 में इंदौर में भयंकर अकाल पड़ा लोग भूख से निढ़ाल होने लगे और 1903 और 1908 के प्लेग की महामारी फैलने से जब लोग मरने लगे सेठ जी ने अपनी तिजोरी खोल दी और इंदौरियों की खूब खिदमत की।


अपने आखरी दिनों में सेठ हुकम चंद ने कीमती रत्नों से जड़े महंगे कपड़े और जेवरात पहनना कम कर दिया और आम लिबाज में रहने लगे। बहुत धार्मिक थे।


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हुकुमचंद सेठ की दी हुई सीख


जिस कारोबार का तजुर्बा और इल्म ना हो उसमें इन्वेस्ट ना करें। आपने ज्यादातर तजुर्बे को एहमियत दी।

बीमार पड़ने पर जब विदेश में ऑपरेशन की नौबत आई तब सेठ ने कहा मुझे इंदौर में ही मरना है। ग्वालियर महाराज के समझने पर भी नहीं माने और इंदौर में डटे रहे। ऐसी थी इंदौर से सेठजी की मोहब्बत। हुकुमचंद सेठ की चौथी पीढ़ी अभी भी इंदौर में भव्य पैलेस इंद्र भवन में रहती है, जिसे हुकुमचंद घंटाघर के नाम से जाना जाता है।

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