
बॉलीवुड का विलेन शुरुआती नेहरूवादी समाजवाद के दौर में मिल मालिक हुआ करते थे. आगे चलकर सबसे ज्यादा विलेन गांव के ठाकुर या सामंत की शक्ल में दिखाए जाने लगे।
ठाकुर का विलेन बनना इतना सामान्य हो गया कि क्षत्रिय जाति की यह छवि समाज में भी रूढ़ हो गई।
हाल ही में एक वेबसाइट ने ठाकुर विलेन की एक लंबी लिस्ट छापी है, जिसमें इस जाति के विभिन्न नकारात्मक और खलनायकी वाले किरदार सामने आते हैं।
इन विलन में राम तेरी गंगा मैली के भागवत चौधरी दुष्ट और दलाल है, डांस-डांस का राजबहादुर ए.एम सिंह बलात्कारी और हत्यारा है, आज का अर्जुन फिल्म का ठाकुर भूपेंद्र सिंह अत्याचारी और हत्यारा है, करण अर्जुन का ठाकुर दुर्जन सिंह बदमाश और हत्यारा है, और शौर्य का ब्रिगेडियर रुद्र प्रताप सिंह अत्याचारी और कानून का उल्लंघन करने वाला है. गुलाल का दुकी बना, दंबग-2 का ठाकुर बच्चा लाल और गैंग्स ऑफ वासेपुर का रामाधीर सिंह भी गुंडा-मवाली-बदमाश है।
लेकिन समाज की हकीकत इससे मेल नहीं खाती. अब विलेन घोड़े पर चढ़कर नहीं आते. ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था के क्षय के कारण गांवों की अमीरी और रूतबा घटा है और जमीनों के मालिकों की पहले वाली हैसियत नहीं रह गई है. काफी सामंत अब गांव की जमीन बेचकर शहर आ चुके हैं या जमीन बटाई पर दे चुके हैं।
साथ ही उच्च नौकरशाही, मीडिया और न्यायपालिका में भी उनकी कोई हनक नहीं बन पाई है. ऐसी हालत में ठाकुर डॉन के लिए टिक पाना आसान नहीं रह गया है।
उत्तर भारत में इस बीच हमने वास्तविक ज़िंदगी मे ब्राह्मण डॉन की एक नई जमात को उभरते और ठाकुर डॉन की जगह लेते देखा है. श्रीप्रकाश शुक्ला और विकास दुबे का नाम यूं ही चमक कर नहीं आया है. बिहार में भूमिहार ब्राहमणों के बीच कई डॉन उभरकर आए हैं।
दरअसल किसी भी डॉन का लंबे समय तक टिका रहना खासकर न्यायपालिका और अफसरशाही के प्रत्यक्ष या प्रछन्न समर्थन से ही संभव है. साथ ही मीडिया की भूमिका डॉन की छवि चमकाने या उसे ज्यादा खूंखार बताने आदि में होती है. ये सब ठाकुर डॉन से छिन चुका है।
जिसका पावर होगा, उसी के डॉन चलेंगे। और पावर का मतलब सरकार ही नहीं, कोर्ट, मीडिया और अफ़सर भी होता है।