सहजयोग के माध्यम से आत्मज्ञान को पाना सहज संभव
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते

मालवा हेराल्ड |भगवद्गीता कहती हैं-
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।* *तत्स्वयंयोग संसिद्धः कालेनात्मनि विन्द्वति ।।
इस जगत मे आत्मज्ञान जैसा पवित्र कुछ भी नहीं है। और ये विमल, निर्मल आत्मज्ञान साधक को कब प्राप्त होता है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, अपने अच्छे कर्म द्वारा जिस साधक का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है, उसे ये ज्ञान अपने आत्मा में प्राप्त होता है, जो उसे अमृतमयी आनंद की प्राप्ति कराता है।
प.पू माताजी श्री निर्मला देवी ने कुंडलिनी जागरण द्वारा सामूहिक आत्म साक्षात्कार देने की कला का निर्माण किया। जिस आत्मज्ञान की बात भगवद्गीता मे कही गयी है इसे सहजयोग मे पाया जा सकता है, इसकी साक्षात अनुभूति ली जा सकती है। श्री माताजी कहते है आप सहजयोग मे आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर लें....
सहजयोग की कृपा से सबसे बडी चीज आपमें घटित होती है वह है आपका आत्मज्ञान को पा लेना.... आपके अंदर ज्योति प्रज्वलित हो उठती है.... आप विराट से जुड जाते है और विराट तत्व को प्राप्त कर लेते है.... यदि आप सच्चे साधक है तो आपको आशीर्वाद मिल जाता है। वास्तव मे सारा ज्ञान आपके अन्तर्निहित है। यह सब आपके अंदर विद्यमान है.... सभी के अंदर आत्मा है और सभी के अंदर अध्यात्मिकता है, ऐसा कुछ भी नही है जो आपको बाहर से मिलता हो।
पर यह ज्ञान प्राप्त करने के पूर्व आप इससे कटे हुए है, या अन्धकार मे होते है और उस अज्ञानता मे आप नही जानते कि आपके अन्दर कौन कौन सी सम्पदा निहित है? अतः गुरु का कार्य यह है कि वह आपको इस बात का ज्ञान कराये कि आप क्या है?
ये पहला कदम है कि गुरू आपके अंदर वह जाग्रति आरंभ करता है जिसके द्वारा आप जान जाते है कि बाह्य विश्व मात्र एक भ्रम है तथा आप अपने अन्तस मे ज्योतित होने लगते है। यह एक आंतरीक यात्रा है। अपने आपकी खोज है, जिसका अनुभव विश्वभर के सहजयोगी साधक ले रहे है, अगर ये लेख पढ़कर आपके हृदय मे जिज्ञासा जाग्रत हुई हो तो आज ही सीखे सहजयोग ध्यान। संपर्क करें www.sahajayoga.org.in पर।