आत्मसाक्षात्कार को पाकर जो विद्यार्जन होता है उसमें बराबर नीर-क्षीर विवेक आ जाता है : श्री माताजी निर्मला देवी जी
ज्ञान की देवी मां सरस्वती की प्रतिष्ठा हमारे मन में बाल्यकाल में ही हो जाती है जब हम विद्यार्जन का प्रारंभ करते हैं। परंतु वास्तव में मां सरस्वती के कार्य की महत्ता को समझने के लिए आत्म ज्ञान का होना आवश्यक है सहजयोग संस्थापिका श्री माताजी निर्मला देवी जी के अनुसार ,

मालवा हेराल्ड |"..... सरस्वती का कार्य बड़ा महान है। महासरस्वती ने पहले सारा अंतरिक्ष बनाया। इसमें पृथ्वीतत्व विशेष है। पृथ्वीतत्व को इस तरह से सूर्य और चन्द्रमा के बीच में लाकर खड़ा कर दिया कि वहाँ पर कोई सी भी जीवन्त क्रिया आसानी से हो सकती है। इस जीवन्त क्रिया से धीरे- धीरे मनुष्य भी उत्पन्न हुआ। परन्तु हमें अपनी बहुत बड़ी शक्ति को जान लेना चाहिए। यो शक्ति है जिसे हम सृजन शक्ति कहते हैं, क्रिएटिविटी (Creativity) कहते हैं। यह सृजन शक्ति सरस्वती का आशीर्वाद है जिसके द्वारा अनेक कलाएं उत्पन्न हुई। कला का प्रादुर्भाव सरस्वती के ही आशीर्वाद से है। .. हमारे बच्चे स्कूलों में विद्यार्जन कर रहें हैं। पर हमें ध्यान रखना चाहिए कि बिना आत्मा को प्राप्त किए हम जो भी विद्या पा रहे हैं वो सारी अविद्या है। बिना आत्मसाक्षात्कार प्राप्त किए आप चाहे साइंस पढ़ें या अर्थशास्त्र, उसे न तो आप पूरी तरह समझ सकते हैं और न ही उसको अपनी सृजन शक्ति में ला सकते हैं.
बच्चे दो प्रकार के होते हैं एक तो पढ़ने के शौकीन होते हैं और दूसरे जिन्हें पढ़ने का शौक नहीं होता। कुछ बच्चों के पास कम बुद्धि होती है और कुछ के पास अधिक । बुद्धि भी सरस्वती की देन है लेकिन आत्मा से मनुष्य में सुबुद्धि आ जाती है
बुद्धि से पाया हुआ ज्ञान जब तक आप सुबुद्धि पर नहीं तोलिएगा तो वह ज्ञान हानिकारक हो जाता है।.. ..... आत्मसाक्षात्कार को पाकर जो विद्यार्जन होता है उसमें बराबर नीर-क्षीर विवेक आ जाता है। वे समझ लेते हैं कि कौन सी चीज़ अच्छी है और कौन सी बुरी है। कौन सी चीज़ सीखनी चाहिए और कौन सी चीज़ नहीं सीखनी चाहिए। ..... आत्मा का साक्षात्कार मिलने से ही सरस्वती की भी चमक आपकी बुद्धि में आ जाती है और जो बच्चे पढ़ने लिखने में कमजोर होते हैं वो भी बहुत अच्छा कार्य करने लग जाते हैं। इसके बाद कला की उत्पत्ति होती है। अगर आप कला को बगैर आत्मसाक्षात्कार के ही अपनाना चाहें तो वह कला अधूरी रह जाती है या वो बेमर्यादा कहीं ऐसी जगह टकराते हैं कि जहाँ उसकी कला का नामोनिशान नहीं रह जाता तो पहले आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त करके ही सरस्वती का पूजन करना बड़ी शुभ बात है।
.. आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति की कला अनन्त की शक्ति से प्लावित होती है। तो आप लोग भी आत्मसाक्षात्कारी हो गए हैं। कलात्मक चीज हठात आपको निर्विचारिता में उतारेगी और उसका सौन्दर्य देखते ही आपको ऐसा लगेगा कि आप निर्विचार हैं क्योंकि सौन्दर्य देखने से ही चैतन्य एकदम बहने लगता है और उस सौन्दर्य के कारण ही एकदम से आप निर्विचार हो जाते हैं। इसलिए आदिशंकराचार्य ने इसे 'सौन्दर्य लहरी' कहा।
.. शान्तिमय, ध्यानावस्था में रहे बिना कला सृजन अधूरा रह जाता है या मर्यादा विहीन । आपको कला का तंत्र तथा तकनीक मालूम होनी चाहिए। जब आपको आत्मसाक्षात्कार है तभी आपकी सृजन कला बढ़ जाती है।"
(प. पू. श्री माताजी, यमुनानगर, 4/4/1992)
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