सर्वधर्म एकीकरण व सद्भाव का साधन : सहजयोग
कलयुग को भ्रांति के युग के रूप में वर्णित किया गया है

मालवा हेराल्ड | अतः पदार्थों, वस्तुओं, संबंधों आदि की ही भांति धर्म व धार्मिकता में भी भ्रांतियों व संशय का समावेश चहुं ओर दृष्टिगत होता है, और एक ही सृष्टा द्वारा रची गई सृष्टि भिन्न-भिन्न आवरणों की तह में लिपटी हुई नजर आती है। ऐसे में सत्य के जिज्ञासु साधकों के लिए श्री माताजी निर्मला देवी जी द्वारा स्थापित सहजयोग एक ऐसी आश्रयस्थली है जहां विश्व के किसी भी धर्म की आलोचना करके स्वयं को श्रेष्ठ प्रमाणित नहीं किया जाता वरन् इन सभी धर्मों की शुभता, शुचिता, श्रेष्ठता व संवेदना को आत्मसात किया जाता है। जो विभिन्न मार्गों से चलकर आए हुए सत्य के साधकों को अपने आधारभूत शाश्वत सत्य से परिचित करवाता है और वह भी प्रमाणिकता के साथ। जिस प्रकार एक ही स्रोत हिमालय से अनेक नदियों का उद्भव होता है जिनका मार्ग, कार्यक्षेत्र,जल का रंग और प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है। परंतु अंत में सागर में सब एकीकृत हो जाती है और पुनः वाष्पीभूत होकर स्वयं अपने स्रोत का माध्यम बनती है। सहज वही सागर है जहां विभिन्नताएं समाप्त हो जाती हैं। व परमशक्ति से आप का सीधा संबंध स्थापित हो जाता है।
श्री माताजी अपनी अमृतवाणी में इसका वर्णन करते हुए कहती हैं,
"मैं सारे ही धर्मों को संपूर्ण रूप से आपको बताना चाहती हूँ, इतना ही नहीं, जो कुछ भी उसमें आधा अधूरापन भाषित होता है उसको मैं पूर्ण करना चाहती हूँ। मैं किसी भी शास्त्र या धर्म के विरोध में हो ही नहीं सकती हूँ, लेकिन अशास्त्र के जरूर विरोध में हूं और अधर्म के और जहाँ कोई चीज अधर्म होती है और अशास्त्र होती है, एक माँ के नाते मुझे आपसे साफ साफ कहना ही पड़ता है, बाद में आपको भी इसका अनुभव आ जायेगा कि मैं जो कहती हूँ वो बिल्कुल सत्य है, प्रैक्टिकल है, जब आप अपने हाथ से बहने वाले इन वाइब्रेशंस को दूसरों पे आजमायेंगे, आप समझ लेंगे कि मैं जो कहती हूँ बिल्कुल सच बात कहती हूँ और पूर्णतया आपके हित के लिए और आपके उत्थान के मार्ग के व्यवस्थित रूप से प्रकाशित होने के लिए कहती हूं।" सहजयोग पूर्ण रूप से प्रेम पर आधारित है। श्री माताजी जी ने स्वयं इस बारे में सहजयोगियों को सदैव ही निर्देशित किया है,
"सबसे पहली चीज है प्रेम करना सीखो, परिवार या संसार या संसार का जो सारा परिवार है या उससे भी बढ़ के मैं कहूँ कि सारी सृष्टि, सारा ही विश्व, सारा ही प्रेम की धुरी पर चलता है"
("सहजयोग व सांख्य दर्शन" भाग 1)
"सहज ध्यान और प्रेम ये दो शब्द मेरे आधार हैं। भीतर ध्यान और बाहर सबसे प्रेम। स्वयं के भीतर ध्यान और संबंधों में प्रेम। सर्वत्र सहजयोग के फूल खिले और प्रेम की गंध उड़े यही मैं चाहती हूँ। ध्यान का अर्थ है भीतर से मुस्कुराना और प्रेम का अर्थ है इस मुस्कुराहट को औरों तक पहुंचाना।" (जनवरी 2011)
विश्व में प्रचलित सभी धर्मों के प्रणेताओं ने धर्म का आधार सदा ही प्रेम बताया है घृणा अथवा ईर्ष्या नहीं। यदि आप वास्तव में सत्य के साधक हैं तो सहजयोग आपकी जिज्ञासाओं का समाधान है।
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