स्त्री परिवार में हृदय के समान होती है प्रेममय व जीवन की वाहक : श्री माताजी निर्मला देवी जी
सहजयोग ध्यान द्वारा अपने अहम पर विजय प्राप्त कर अपनी वास्तविक शक्ति को पहचनना संभव

मालवा हेराल्ड |मानवजाति का विभेदन परमात्मा ने स्त्री व पुरुष के रूप में किया है। ये दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। स्त्री पुरुष की शक्ति के रूप में कार्य करती है। वर्तमान में शिक्षा पद्धति के द्वारा स्त्री-पुरुष शिक्षित तो हो जाते हैं परन्तु एक अहम भी विकसित होता है स्वयं को सर्वोपरि मानने का। यही कारण है आज विवाह विच्छेद के बढ़ते मामलों का। परंतु आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति के पश्चात् हम अपने आपको संतुलन में पाते हैं और अपने अहम पर भी विजय प्राप्त कर सकते हैं। श्री माताजी निर्मला देवी जी ने स्त्री की भूमिका को कुछ इस प्रकार स्पष्ट किया है कि,
"एक पुरुष वो व्यक्ति होता है जो परिवार का मुखिया ( मस्तक ) होता है , जैसा आप कहते हैं । अब , उसे मुखिया होना ही पड़ता है , कुछ कारणों की वजह से उसे मुखिया होना पड़ता है । पुरुष का मुखिया होना कुछ भी गलत नहीं है , ये ठीक है - आप हृदय बन जाईये । हृदय मस्तक से ज़्यादा महत्वपूर्ण है । शायद हम ये नहीं समझते कि हृदय कितना जरूरी है । आप देखिये , यदि मस्तक काम करना बंद भी कर दें तो भी हृदय चलता रहता है । हम तब तक चल सकते हैं जब तक हमारा हृदय चल रहा है । परंतु यदि हृदय थम जाए तो मस्तक भी थम जाता है । इसलिये आप एक स्त्री होते हुए हृदय हैं और वो ( पति ) मस्तक हैं । उनमें ऐसी भावना रहने दीजिये कि वो मस्तक ( मुख्य ) हैं ; ये केवल एक भावना है , केवल भावना । जैसे कि मस्तक को लगता है कि वही सारे निर्णय लेता है । परन्तु वो दिमाग है , जो ये भी जानता है कि उसे हृदय का भी ख्याल रखना होता है । वह हृदय है जो सर्वव्यापी है , जो सभी चीज़ों का वास्तविक स्रोत है । इसलिये एक स्त्री का स्थान , अगर वो समझे कि कितना महत्वपूर्ण है , तो वो अपने आप को कभी भी नीचा या शोषित नहीं महसूस करेगी यदि वह जानती है कि वो हृदय है । मैं सोचती हूँ कि इसी मुद्दे को लोगों ने , महिलाओं ने , खास कर पश्चिम में , खो दिया है और भुला दिया है और कभी महसूस नहीं किया है । अगर वे इस चीज़ को समझती तो वहाँ बहुत कम समस्यायें होती ..... हृदय शक्ति है : हृदय दूसरी सभी चीज़ों से शक्तिशाली है । वह हृदय है , जिसके पास मस्तिष्क को ढ़कने और शान्त करने की शक्ति होती है । मस्तिष्क एक सिरदर्द है , आप जानते हैं , ये काम करता है और पागलों की करता है । परंतु , वो हृदय है , जो वास्तव में पूरे शरीर को अपने प्रेम से ढ़क सकता है और उसे शांत कर सकता है और उसे आनन्द दे सकता है । वो हृदय जिसके अन्दर आत्मा होती है । इसलिये यह बहुत महत्वपूर्ण चीज़ है , जो कि शक्ति है ... " ( १ ९ ८० , विवाह का महत्व , यू.के )
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