विश्व के सभी धर्मो का समावेश है- विश्व निर्मल धर्म सहजयोग
सहजयोग

महान भूमि पर अनेक अवतरण हुए और सभी अवतरणों ने एक ही मुख्य विषय पर बल दिया और वह है - स्वयं की जागृति यहां जागृति का संबंध स्वयं की आत्मा की जागृति से है। सहजयोग संस्थापिका श्रीमाता जी निर्मला देवी ने यह बात समाज में रखी कि जब हमारे अंदर स्थित परमात्मा का अंश जो कि आत्मा रूप मे स्थित है वह जागृत हो जाए। तब हम आत्मा के प्रकाश से ही सत्य को पहचान सकते है। सत्य यही है कि हम यह मन, काया, विचार, बुद्धि अहंकार नही हैं, हम तो केवल एक आत्मा है जो ईश्वर के प्रेम का आनंद ले रही है। सहजयोग का प्रथम चरण, कुंडलिनी जागरण से हम अपने आत्म तत्व को जगा सकते है कुंडलिनी हम सभी में स्थित परमात्मा का प्रतिबिंब है जो कि माँ स्वरूप में हमारी रीढ़ की हड्डी के अंतिम सिरे पर सुप्त अवस्था में है। सहजयोग के माध्यम से हम अपनी कुंडलनी शक्ति को जागृत कर सकते हैं चाहे मानव किसी भी धर्म, उम्र, जाति या रंग का हो सब में यह शक्ति विद्यमान है। कुंडलिनी के जागरण का वर्णन ज्ञानेश्वरी मे भी किया गया जब इस शक्ति का जागरण हो जाता है, तब हमें चैतन्य शक्ति का अनुभव होता है जिसे फूल का खिलना है, फलो का उगना है, पेड़ो का बढ़ना है, पानी का बहना है, इसी चैतन्य शक्ति से घटित होता है, उस शक्ति को हम अपने तालु भाग और हथेलियो पर ठंडी ठंडी हवा के रूप मे महसूस करते हैं। विभिन्न धर्म ग्रंथों में इसे वाइब्रेशन, चैतन्य, ऋतंभरा प्रज्ञा आदि नामों से जाना जाता है। सहजयोग में सभी धर्मो का, अवतारों का समावेश है। इसलिए इसे विश्व निर्मल धर्म भी कहा गया है।
इस योग की प्रक्रिया में ध्यान से जुड़ने की वास्तविक युक्ति सहज योग द्वारा अत्यंत सरलता से नि:शुल्क सिखाई जाती रही है। उपरोक्त बताई गई जानकारी का विस्तृत अध्ययन करने के लिए यदि साधक कोई भी प्रश्न अपने मन में रखता है तो वह हमारे टोल फ्री नंबर 18002700800 पर कॉल कर सकते हैं या वेबसाइट www.sahajayoga.org.in पर देख सकते हैं।