अष्टसिद्धियों व नवनिधियों की स्वामिनी श्री मां सिद्धिदात्री की आराधना का पर्व है महानवमी
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तुत।।

मालवा हेराल्ड |भारतीय सनातन धर्म-दर्शन की यह विशेषता है कि इसमें सच्चिदानन्द ब्रह्म की मातृरूप में आराधना की गई है। नवरात्रि के नौवें दिन शक्ती स्वरुपिणी माँ दुर्गा के सिद्धीदात्री' स्वरूप को पूजा जाता है। देवी मां अपने भक्तो पर सभी प्रकार की सिद्धियों की वर्षा करती हैं इसलिये इन्हें "सिद्धीदात्री" कहा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माँ सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सभी आठों सिद्धियों जिनमें, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, और नौ निधियों से पूर्ण कर देती हैं।
परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी जी वर्णित करती हैं कि ये सिद्धीदात्री देवी चौदह भुवनों की स्वामिनी हैं।
हर मनुष्य के अंदर देवी की सारी शक्तियाँ सुप्तावस्था में हैं और ये सारी शक्तियाँ मनुष्य अपने अंदर जाग्रत कर सकता है। ये सुप्तावस्था की जो शक्ति है उनका कोई अन्त नही, न ही उनका अनुमान कोई लगा सकता है क्योंकि यह सारे देवी- देवता आपके अंदर विराजमान हैं।
शक्तियों को जागृत करने के लिए प्रथम कार्य है कि ज्योति प्रज्वलित हो और उसके लिये आत्मसाक्षात्कार - नितांत आवश्यक है। सहजयोग मे जो भी साधक शुद्ध इच्छाशक्ति से ये आत्मसाक्षात्कार माँगता है उसे ये सहज, अनायास -प्राप्त हो जाता है। परंतु आत्मसाक्षात्कार पाते ही सारी शक्तियाँ जागृत नही हो सकती। इसके लिए ध्यान करना आवश्यक है l इसीलिए साधु-संतो, मुनीयों ने कहा है कि आप देवी की उपासना करें आराधना करें, पूजा के प्रति आपका दृष्टिकोण ऐसा होना चाहिये कि मानो देवी ने आपको मंत्र मुग्ध कर दिया हो। इस प्रकार आपको स्तुतीगान करना चाहिये । यह कोई बौद्धिक सूझबूझ नही है, ये स्तुतिगान तो आप देवी को श्रद्धा, समर्पण कर रहे है।
आज नवमी के दिन हमें देवी 'सिद्धिदात्री से प्रार्थना करनी चाहिये। प्रार्थना तो ह्रदयाभिव्यक्ति है, अतः इसे पूर्ण भक्ति के साथ किया जाना चाहिये।
नवरात्रि में देवी की आराधना के द्वारा स्वयं के उत्कर्ष को प्राप्त करने के संबंध में स्वयं श्री माताजी ने अपनी अमृतवाणी में वर्णित किया है कि,
"आज नवरात्रि का अन्तिम दिन है । जैसे आप अपने अन्दर देखते हैं , हम सबके लिए यह परमोत्कर्ष बिन्दु होना चाहिए । हमारे अन्दर उत्थान के लिए सात चक्र हैं और दो चक्र इनसे ऊपर हैं । अतः इन सभी नौ चक्रों को इसी जीवन में पार करना आवश्यक है । यही आपका लक्ष्य होना चाहिए ।" (प.पू. श्री माताजी, पुणे,19/10/1988)
उपरोक्त वर्णित सभी आशीर्वाद पाने के लिए, आत्मसाक्षात्कार का अनुभव करने के लिए, आप हमारे टोल फ्री नंबर 18002700800 पर कॉल कर सकते हैं या वेबसाइट www.sahajayoga.org.in पर देख सकते हैं।