द्वितीय नवरात्रि - मां ब्रह्मचारिणी की आराधना तथा स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करने का अद्वितीय अवसर
(सृजनात्मकता व कलात्मकता को जागृत करने का विशेष पर्व द्वितीय नवरात्रि)

मालवा हेराल्ड |मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से दूसरा स्वरूप श्री ब्रह्मचारिणी का है। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। इनके बाएं हाथ में कमण्डल और दाएं हाथ में जप की माला रहती है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों को अनंत फल प्रदान करने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होता है।
मानव के शरीर में स्वाधिष्ठान चक्र, रचनात्मकता, कलात्मकता, सृजनात्मक शक्ति के लिए जाना जाता है। श्री माताजी निर्मला देवी जी ने स्वाधिष्ठान चक्र के संबंध में वर्णन किया है कि-
"ब्रह्मदेव की सृजनात्मक शक्ति उनकी संगिनी ( शक्ति ) सरस्वती के रूप में इस चक्र पर अवतरित होती हैं । वे ज्ञान और विद्या की देवी हैं ... मनुष्य को ज्ञान का सच्चा अर्थ समझाने के लिए उनकी ये छवि प्रकट होती है । प्रायः उनके एक हाथ में वीणा होती है जो इस बात की प्रतीक है कि ज्ञानवान व्यक्ति को ईश्वरी संगीत का ज्ञान होना आवश्यक है । भारतीय शास्त्रीय संगीत मूल आदि नाद ( ब्रह्मनाद ) पर आधारित है ।..... अत : इस चक्र पर ये देवी वीणा के साथ दिखाई देकर ये सुझाती हैं कि यदि आप विद्वान हैं तो आपको संगीत का ज्ञान होना भी आवश्यक है । केवल इतना ही नहीं , विद्वान व्यक्ति को नीरस न होकर सृजनात्मकता के सौन्दर्य ( माधुर्य ) का आनन्द उठाने वाला होना चाहिए । अपने दूसरे हाथ में वे माला धारण करती हैं । इस प्रकार ये सुझाती हैं कि ज्ञानार्थी व्यक्ति को परमात्मा में श्रद्धा होनी चाहिए और वह परमात्मा के शाश्वत प्रेम की सराहना करने वाला होना चाहिए।
अतः साधक को , विद्या के भक्ति पक्ष में कुशल होना आवश्यक है । उसके अध्ययन मुख्य उद्देश्य शाश्वत सत्य की खोज होना आवश्यक है । सच्चे भक्त की यही पहचान है कि वह विवेक खोजता है , सतही ज्ञान नहीं । अपने तीसरे हाथ में देवी सरस्वती ज्ञान की पुस्तक धारण करती हैं और इस प्रकार सुझाती हैं कि विद्वान व्यक्ति को ज्ञान साधना में खोजे गये शाश्वत सत्यों के विषय में ग्रन्थों का सृजन करना चाहिए ।"
(परम पूज्य माता जी के ग्रंथ *सृजन* से साभार)
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