भारतीय संस्कृति बहुत ऊंची है तथा यही एक दिन संसार का मार्गदर्शन करेगी। -- श्री माताजी
भारतीय संस्कृति की गहनता को समझना और उसे अपनाना ही सहजयोग है

मालवा हेराल्ड |संस्कृति किसी भी समाज के इतिहास उसकी श्रद्धा उसके सोच विचार , उसकी भावनाओं और उसके आदर्शों की देन होती है ।... संस्कृति सामाजिक शांति , विवेक और नैतिकता को दर्शाती है । अबोधिता एवं आध्यात्मिकता की अन्तर्जात संस्कृति शान्ति , ईमानदारी एवं नैतिक विवेक का सृजन करती है । भारतीय संस्कृति सनातन संस्कृति है जिसका विकास ऋषियों व मनीषियों द्वारा प्रायोगिक अध्ययन के पश्चात् किया गया है। सहजयोग का संस्थापन भी श्री माताजी निर्मला देवी जी द्वारा इसी संस्कृति की नींव पर किया गया है। श्री माताजी के अनुसार,
"आप लोग इस महान पुण्य भूमि भारत में पैदा हुए कृपया अपनी धरोहर आपने जो पाया हुआ है उसे जानने की कोशिश करें क्योंकि हमारी जो भारतीय संस्कृति है ये आत्मा की पोषक है , यही आत्मा को बढ़ावा देने वाली है । बाकी किसी भी संस्कृति में आत्मा की ओर चित्त नहीं दिया गया है इसलिये इस संस्कृति की ओर चित्त दें , उसको समझने की कोशिश करें और अपने जीवन में उसे लाने की कोशिश करें ।"
(प.पू.श्रीमाताजी)
"कण - कण में व्याप्त हो जाने वाली परमात्मा की ऊर्जा से हमारा सम्बन्ध जोड़ने के लिए शुद्ध इच्छा शक्ति है जिसे मनुष्य की पवित्र अस्थि में रखा गया है और जो कुण्डलिनी कहलाती है । - मानव के अन्दर शुद्ध इच्छा रूपी यह सुप्त शक्ति है । यह आदिशक्ति ( परमात्मा की शक्ति ) या होली घोस्ट की प्रतिबिम्ब है । - जाग्रत होकर जब यह सर्वव्यापक शक्ति से जुड़ जाती है तो मानव में चतुर्थ आयाम का विकास आरम्भ होता है । आध्यात्मिक जीवन का यह विकास एक नई अवस्था है , जिसमें मनुष्य अपने अन्तर्जात देवत्व में उन्नति करने लगता है यह इसके शारीरिक , मानसिक भावनात्मक तथा आध्यात्मिक अस्तित्व का पोषण करता है और उसे प्रकाशित करता है ।"
(प.पू. श्रीमाताजी सहजयोग से)
सहजयोग इसी कुंडलिनी शक्ति के जागरण का विज्ञान है जिसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति के पश्चात् ध्यान धारणा द्वारा पुष्ट किया जाता है। सहजयोग शारीरिक क्रियाओं का नहीं बल्कि आत्मा से परमात्मा का योग है जिसका वर्णन श्री कृष्ण ने गीता में किया है तथा जिसे श्री शंकराचार्य जी ने सौंदर्य लहरी में वर्णित किया गया। यह अनुभव का विज्ञान है। अतः इस अनुभव को एक अवसर अवश्य प्रदान करना चाहिए।
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