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ईश्वर के शुद्ध स्वरूप को जानने की अबोध जिज्ञासा ही वह शुद्ध वृत्ति है जिससे योग की युक्ति की प्रक्रिया संपन्नहोती है

सहजयोग

ईश्वर के शुद्ध स्वरूप को जानने की अबोध जिज्ञासा ही वह शुद्ध वृत्ति है जिससे योग की युक्ति की प्रक्रिया संपन्नहोती है

मालवा हेराल्ड |आज विश्व में भारतीय योग की अवधारणा अति उत्साह से स्वीकारी जा रही है। परंतु अष्टांग योग जो यम, नियम ,आसन ,प्राणायाम ,प्रत्याहार, ध्यान ,धारणा ,समाधि इस प्रकार आठ अंगों को अपने में समाए हुए हैं।इसमें ध्यान धारणा व समाधि का आनंद तभी लिया जा सकता है जबकि इस प्रक्रिया की टेक्नीक याने इस योग की युक्ति को सही ढंग से समझना भी आवश्यक है। सहज योग की संस्थापिका परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी जी ने योग की युक्ति के बारे में बताया है कि युक्ति के दो अर्थ हैं एक है जुड़ना अर्थात एकाकार होना और दूसरा है योजना प्रक्रिया को समझना सहज योग इन दोनों कार्यों में साधक को निष्णात बनाता है।
*योगश्चित्तवृत्ति निरोधः* यह सूक्ति
पतंजलि ऋषि की योग प्रदीप पुस्तक में सर्वाधिक प्रसिद्ध सूक्तियों में से एक है।जो योग में चित्त के महत्व को बताती है और चित्त में वृत्ति के महत्व को बताती है। शरीर ,मन ,बुद्धि से लेकर चित्त और आत्मा तक की संपूर्ण यात्रा योग की युक्ति में समाई है परंतु इसे पाने के लिए मानव में वृत्ति होना चाहिये।
सहज योग अत्यंत सरलता से मन को प्रवृत्तियों से हटाकर निवृत्ति की ओर ले जाता है। ईश्वर के शुद्ध स्वरूप को जानने की अबोध जिज्ञासा ही वह शुद्ध वृत्ति है जिससे योग की युक्ति की प्रक्रिया संपन्न होती है
सहज योग प्रणेता श्री माताजी अनुभव सिद्ध ध्यान बारीकी बताती हैं कि – "हमें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। जैसे पुरुष को स्त्री पर निर्भर होना पड़ता है, और स्त्री को पुरुष पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन जब अहंकार बीच में आ जाता है, तो यह अहंकार केवल आपको एक-दूसरे से अलग ही नहीं करता, और यह केवल यहीं तक ही सीमित नहीं रहता, अपितु यह अहंकार आपको यह भी सिखाता है कि आपको किसी के ऊपर निर्भर नहीं रहना है। आपको दूसरों पर निर्भर होना पड़ेगा। आपने दूसरों का अनुचित लाभ नहीं उठाना, लेकिन पहली महत्वपूर्ण चीज यह है कि आपको दूसरों पर, और दूसरे लोगों को आप पर निर्भर होना पड़ेगा।..." (–परम पूज्य माताजी श्री निर्मला देवी 5 जून 1979)
ईश्वर को हम चाहे किसी भी नाम रुप प्रतिमा धर्म से मानते हों परंतु यह धुव सत्य है कि वह निराकार है और कण कण में व्याप्त है। उसे देखा नहीं जा सकता और आत्मा को जगाए बिना अनुभव भी नहीं किया जा सकता।
सवेरे उठकर के ध्यान कैसे करें।
"पहले नतमस्तक होके अपने को अपने हृदय में नत करें, पहली चीज है नत करना, "Humble down yourself," किसी ने ये सोच लिया कि मैंने बहुत पा लिया या मैं बहुत बड़ा संत महात्मा हूँ तो समझ लीजिये वो गया, सहजयोग से गया, अत्यंत नम्रतापूर्वक अपने हृदय की ओर ध्यान करके नतमस्तक होके फोटो के सामने दोनों हाथ करके शांतिपूर्वक आज्ञा लेकर बैठें, बात बात में क्षमा मांगनी पड़ती है, सो उस वक्त भी क्षमा मांग करके कि हमसे अगर कोई गलती हो, उसे माफी करके ध्यान में आज हमें उतारिये, इस तरह की प्रार्थना करके जिन्होंने से हमने वैर किया है, सबको माफ कर देते हैं और हमने किसी से वैर किया है तो तुम हमें माफ कर दो, अत्यंत पवित्र भावना मन में ला करके और आप ध्यान में जायें, आंख बंद करके और थोड़ी देर ध्यान करें।...."
ध्यान कैसे करें 29 मई 1976 मुम्बई से साभार।
सहजयोग में आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर तत्काल आनंद की अनुभूति प्राप्त करें यह कार्य श्रीमाताजी के माध्यम से होता है।।
अतः ऑनलाइन अनुभूति व गहराई प्राप्त करने का प्रयास हेतु www.sahajayoga.org.in वेब स्थली लिंक से संपर्क करें।

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