परम से जुड़ने की शक्ति आपके भीतर है : परम पूज्य माताजी श्री निर्मला देवी
शुद्ध इच्छा सम्पूर्ण मानव जाति के शरीर में कुंडलिनी नाम से एक पावन अस्थि के भीतर होती है

मालवा हेराल्ड |सम्पूर्ण सृष्टि परमात्मा की सूक्ष्म शक्ति परम चैतन्य स्वरूप मे कण कण में व्याप्त हैं। इस सूक्ष्म शक्ति से जुड़ने के लिए प्रत्येक मानव को शुद्ध इच्छा करनी होती है। ये शुद्ध इच्छा सम्पूर्ण मानव जाति के शरीर में कुंडलिनी नाम से एक पावन अस्थि के भीतर होती है। ये इतनी पवित्र है कि जब तक मानव स्वयं इसे परमात्मा की सूक्ष्म शक्ति से एकाकार करने की शुद्ध इच्छा व्यक्त नहीं करता तब तक यह जाग्रत नहीं होती है। इस पावन अस्थि को 'सेक्रम बोन' भी कहते है। जो मानव के मेरूरज्जू (रीढ़ की हड्डी) के आधार पर त्रिकोणाकार स्वरूप में स्थित रहती है, इसी में कुण्डिलनी सुप्तावस्था में साढ़े तीन कुण्डल में विधवान रहती है। जिस प्रकार किसी यंत्र का संबंध विद्युत के किसी स्त्रोत के साथ जोड़ने के लिए तार की आवश्यकत होती है ठीक उसी प्रकार कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने के लिए मानव को परमात्मा से एकाकार की शुद्ध इच्छा का होना अत्यन्त आवश्यक है। इसी शुद्ध इच्छा के घटित होते ही कुण्डिलनी के कुछ सूत्र आरोहित होकर मानव के ब्रहम रन्ध्र (सिर के तालू भाग) को भेदते हुए अन्ततः मानव को परमात्मा की सर्वव्यापक शक्ति से जोड़ देती है।
यह एक बड़ी सहज,सुखद एवं जीवन्त क्रिया है जो अन्तःकरण में गहन शान्ति स्थापित करती है। इस घटना के अन्तर्गत कई बार व्यक्ति अपने सिर के तालु भाग में सहज ही शीतल लहरियों के प्रवाह को भी महसूस करता है तथा कई बार कुछ गरम या हलचल को भी महसूत करता है जो मानव स्वयं ही अनुभव करके प्रमाणित करता है। इन शीतल लहरियो को व्यक्ति अपने चहुँ ओर हाथों की हथेलियो उगलियों पर भी महसूस कर सकता है।
सहजयोग ध्यान आत्मसाक्षात्कार द्वारा मानव अध्यात्मिक अस्तित्व की अन्तिम अवस्था को प्राप्त कर आत्मा की शुद्धता को प्राप्त करते हुए ईश्वर से एकाकार हो जाता है l
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