प्राचीन धर्मग्रंथों में वर्णित है सहजयोग
आत्मा को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में स्थित परमात्मा से जोड़ना, एकाकार कराना

मालवा हेराल्ड |अपने भारत देश को योगभूमि कहा गया है । योग शब्द ' युज ' धातु से बना है । युज शब्द का अर्थ है 'जोड़ना'। आत्मा को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में स्थित परमात्मा से जोड़ना, एकाकार कराना | सहजयोग में प.पू श्री माताजी की कृपा से जब आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है तब साधक इस योग का साक्षात अनुभव करता है, "र्निविचार समाधि" का आनंद उठाता है । शीतल चैतन्य लहरियाँ उसके हाथ से और ब्रह्मरंध्र के तालू भाग से बहना शुरू हो जाती हैं । यह अत्यंत आनंददायी प्रक्रिया है जिसे प्रत्येक सहजयोगी साधक ने अनुभव किया है ।
आत्मबोध कराने वाला ये योग कितना प्राचीन है यह बताने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता मे कहा है-
" इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्यम्। विवस्वान्मनवे प्रवाह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।। "
यहां भगवान कहते हैं कि यह अविनाशी योग मैने सूर्य को बताया था सूर्य ने अपने पुत्र मनु को बताया और मनु ने उसके पुत्र राजा इक्ष्वाकु को बताया ।
आदिशंकराचार्य ने सौंदर्यलहरी नामक ग्रंथ लिखा , उस ग्रंथ में उन्होंने कुंडलिनी जागरण की इस रहस्यमयी प्रक्रिया को उद्घाटित किया है। उस ग्रंथ मे उन्होने कुंडलिनी शक्ति को त्रिपुरारि सुंदरी कहा वो कहते हैं,
"मही मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं, स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमा काशमुपरि। मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं, सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे।।
जब त्रिपुरारि सुंदरी, आदीशक्ती की कृपा से कुंडलिनी शक्ती उर्ध्वगामी होती है तब वह मूलाधार चक्र में पृथ्वी तत्व को मणिपूर चक्र मे जलतत्व को स्वाधिष्ठान चक मे अग्नितत्व को अनाहत चक मे वायु तत्व को , विशुद्धी चक्र मे आकाशतत्वको , आज्ञा चक्र में मनस तत्व को अर्थात (सुषुम्णा नाडी) पर अधिष्ठित षट्चको का भेदन कर सहस्त्रदल पर आती है । इस चिदानंद स्वरूप का जो ध्यान करते है वो धन्य है क्योंकि वो परमानंद के धनी होते है।
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