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वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

(प्रथम नवरात्रि मां शैलपुत्री की आराधना का दिवस )

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

मालवा हेराल्ड |भारत के प्रमुख पर्वों में से एक है नवरात्रि। नवरात्रि का पर्व वर्ष में दो बार धूमधाम से मनाया जाता है।
नवरात्रि में देवी के नौ रूपों का पूजन व साधना की जाती है वस्तुतः यह सभी स्वरूप स्वयं आदिशक्ति द्वारा समय व आवश्यकतानुसार धारण किए गए हैं। स्वयं आदिशक्ति श्री माताजी निर्मला देवी जी ने अपनी अमृतवाणी में इसका उल्लेख किया है
"देवी नौ बार पृथ्वी पर आईं, देवी ने उन सभी लोगों से युद्ध किया जो साधकों का विनाश कर रहे थे तथा उनका जीवन दूभर कर रहे थे। सताए हुए इन महात्माओं ने देवी से प्रार्थना की, उन्होंने भगवती की पूजा की और देवी नौ बार आवश्यकतानुसार अवतरित हुईं।
(प.पू. श्री माताजी, 27/9/ 1992, कबैला)
नवरात्रि के प्रथम दिवस मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है। मां शैलपुत्री, श्री आदिशक्ति का प्रथम अवतरण मानी जातीं हैं क्योंकि इससे पूर्व श्री आदिशक्ति सुरभि गाय के रूप में अवतरित हुई थीं।
श्री माताजी ने इसकी व्याख्या अपनी अमृत वाणी में इस प्रकार की है,
"......यह उनका पहला अवतार है, और उन्होंने हिमालय में जन्म लिया था। इसलिए उन्हें शैलपुत्री (हिमालय की पुत्री) कहा जाता है। उसके और भी नाम हैं। लेकिन शैलपुत्री का विशेष महत्व है क्योंकि उन्होंने पहली बार अवतार लिया था। वह हिमालय की अत्यधिक ठंडी परिस्थितियों में पैदा हुई थी क्योंकि उसे जो कुछ भी हासिल करना था, वह उस वातावरण तक ही सीमित था।(नवरात्रि पूजा, नोएडा,5 अप्रैल, 2000)
मां शैलपुत्री वृषभ पर सवार होती हैं। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प शोभायमान होता है। इनकी उपासना में योगी जन अपना ध्यान मूलाधार चक्र पर केंद्रित करते हैं।
शक्ति की अर्चना के पर्व नवरात्रि पर देवी के विभिन्न स्वरूपों का अनुभव अपने हृदय में करने हेतु श्री माता जी के सानिध्य में कुंडलिनी जागरण द्वारा अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त कर श्री आदिशक्ति की चैतन्य लहरियों का आनंदानुभव अवश्य प्राप्त करें।
कुंडलिनी जागरण द्वारा आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने www.sahajayoga.org.in और टोल फ्री नम्बर 18002700800 पर सम्पर्क करें।

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