मानव के आध्यात्मिक उत्थान के लिए संकल्पित है सहजयोग
सहजयोग

मालवा हेराल्ड |सहजयोग की स्थापना श्री माताजी निर्मला देवी जी के द्वारा 5 मई 1970 में की गई थी। श्री माताजी ने बताया कि एक व्यक्ति की पहचान मैं से नहीं होती है, मैं (व्यक्ति विशेष ) सर्वशक्तिमान ईश्वर का अंश है। उन्होंने व्यष्टि के बारे में नहीं समष्टि के बारे में बताया । अपनी उत्क्रांति पाने के लिए मानव को सामूहिकता में भी ध्यान करना होता है। उन्होंने कुण्डलिनी आत्म-साक्षात्कार का प्रचार प्रसार किया। सहजयोग पूरी तरह से अध्यात्मिक है। यह साधकों के अध्यात्मिक उन्नति पर बल देता है। ध्यान के माध्यम से यदि कोई साधक प्रतिदिन 10 मिनट सुबह शाम ध्यान करता है, तो वह आत्मिक मन की शांति प्राप्त कर बीमारियों से मुक्ति पाता है और शारीरिक और मानसिक रूप से विकसित भी होता है, एंव अध्यात्मिक रूप से भी उन्नत होता है इतिहास में देखेंगे तो एक उदाहरण से स्पष्ट होता है कि आंतरिक परिवर्तन किस प्रकार अंदर सुधार करता है राजा अशोक, अनेक घटनाओं से अंतरात्मा में विचलन पैदा हुआ लेकिन जब उन्हें आत्म-साक्षात्कार हुआ तो वह शांति प्रिय हो गये । मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक, अध्यात्मिक आदि उत्थान के लिए सहजयोग की पद्धति के अनुसार ध्यान करें और सुरक्षित एवं सुखमय जीवन व्यतीत करें।
इस योग की प्रक्रिया में ध्यान से जुड़ने की वास्तविक युक्ति सहज योग द्वारा अत्यंत सरलता से नि:शुल्क सिखाई जाती रही है। उपरोक्त बताई गई संक्षिप्त जानकारी का विस्तृत अध्ययन करने के लिए यदि साधक कोई भी प्रश्न अपने मन में रखता है तो वह हमारे टोल फ्री नंबर 18002700800 पर कॉल कर सकते हैं या वेबसाइट www.sahajayoga.org.in पर देख सकते हैं।