top of page

मानव व्यक्तित्व में सत्वगुण के विकास का माध्यम है सहजयोग

सहजयोग

मानव व्यक्तित्व में सत्वगुण के विकास का माध्यम है सहजयोग

मालवा हेराल्ड |शास्त्रोक्त वर्णन के अनुसार प्रत्येक मनुष्य में तीन प्रकार के गुणों का समावेश होता है रजोगुण, तमोगुण तथा सत्वगुण तीनों में से जो भी गुण प्रभावी होता है वही मनुष्य के स्वभाव का भी निर्धारण करता है। अधिकांशतः सामान्य व्यक्तियों में यह तीनों ही गुण समय और परिस्थिति के अनुसार अपना प्रभाव दर्शाते रहते हैं तथा कुछ लोगों में कोई एक गुण अत्यंत प्रभावी हो जाता है। और उसी के अनुसार उस व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है। रजोगुण का स्वभाव द्वेअ द्रोह, उत्कंठा, निद्रा, अजितेंद्रियत्व और गर्व उत्पन्न करता है। यह गुण भविष्य के विचारों व चिंता को प्रेरित करता है। तमोगुण का स्वभाव मोह, उद्वेग करने वाला, आलस्य, अज्ञान, निद्रा, दीनता, भय, आदि वृत्ति को बढ़ाने वाला होता है। यह गुण मनुष्य को भूतकाल की ओर खींचता है। सत्वगुण का स्वभाव है, सत्य की खोज करना और परम सत्य वह है जो परिस्थिति काल अथवा स्थान के अनुसार परिवर्तित नहीं होता। भौतिकता से परे आत्मज्ञान ही वह परम सत्य होता है जो आत्मा की जागृति के साथ ही हमें शाश्वत् परम शक्ति से साक्षात् करवाता है। अधिकांशतः हम अपने जीवन काल में रजोगुण व तमोगुण के बीच झुलते रहते हैं, और अंततः जब हम सोचते हैं कि सब बेकार की चीजें हैं अब हमें सत्य जानना चाहिए तब खोज शुरू हो जाती है और आप सत्वगुणी हो जाते हैं। सत्वगुण बढ़ाने के लिए तमो और रजोगुण को सत्वगुण में विलीन करना होगा। वासनाओं से मुक्ति यानी कि सत्वगुण का उदय हमें ये समझना चाहिए कि हमारा अंतिम लक्ष्य क्या है ? परमपूज्या श्री माताजी निर्मला देवी जी के अनुसार हमारे विकास का अंतिम लक्ष्य आत्मा बनना है जो हमारे हृदय में सर्वशक्तिमान परमात्मा का प्रतिबिंब है। श्री माताजी द्वारा संस्थापित सहजयोग के माध्यम से ध्यान द्वारा साधक आत्मसाक्षात्कार प्राप्ति के पश्चात निर्विचार होकर शांत चित्त हो जाता है। उसकी दृष्टि तथा चित्त भी वासना और लोभविहीन हो जाते हैं तथा उसका स्वभाव अबोधिता व करुणा से परिपूर्ण हो जाता है। ऐसे व्यक्तित्व पर समय की पकड़ ढीली पड़ जाती है और आयु का असर रूक जाता है। साधक कर्म करता है परंतु वे अहंकार रहित होने के कारण अकर्म बन जाते हैं, पारिवारिक वातावरण के कारण भूतकाल के बंधन जो कि व्यक्ति पर बाध्य होते हैं पूरी तरह छूट जाते हैं और एक नई पावन संस्कृति उस में अभिव्यक्त होती है। ऐसा व्यक्ति गुणातीत, कालातीत व धर्मातीत हो जाता है उसका कोई विशेष धर्म नहीं होता वह जो भी करता है धर्म ही करता है उसके द्वारा अधर्म नहीं होता। उसका व्यक्तित्व शांति सुख एवं आनंद देने वाला हो जाता है। रजोगुण और तमोगुण से ऊपर उठकर सत्वगुण को विकसित कर सत्य को प्राप्त करने हेतु श्री माताजी द्वारा प्रदत्त सहजयोग एक अनमोल ध्यान प्रक्रिया है। सहजयोग अत्यंत सहज व पूर्णतया नि:शुल्क ध्यान पद्धति है। उपरोक्त बताई गई संक्षिप्त जानकारी का विस्तृत अध्ययन करने के लिए यदि साधक कोई भी प्रश्न अपने मन में रखता है तो वह हमारे टोल फ्री नंबर 18002700800 पर कॉल कर सकते हैं या वेबसाइट www.sahajayoga.org.in पर देख सकते हैं।

 FOLLOW US

  • Facebook
  • Instagram
  • LinkedIn
  • Pinterest
  • Twitter
  • YouTube
bottom of page