अहं केवल एक है और वह है सर्व शक्तिमान परमात्मा
सहज योग

मालवा हेराल्ड | योगी की दृष्टि, मानव की दृष्टि और भगवान की दृष्टि सहजयोग में आकर योगी की दृष्टि सहजभाव से मानव मे जागृत हो जाती है। "वास्तव में जब आप अपनी दृष्टि इधर उधर घुमाते हैं, तब आप का चित्त इधर-उधर होता है तो केवल आपका "अहँ" आप पर काबू पाने का प्रयत्न कर रहा होता है। परंतु वास्तव में "अहं" पूर्ण मिथ्या है क्योंकि अहं तो केवल एक ही है और वह है सर्व शक्तिमान परमात्मा वास्तव में अहम का अस्तित्व ही नहीं है, यह मिथक है। यह बहुत बड़ा मिथक है क्योंकि आप यह सोचने लगे कि आप ही सभी कुछ कर रहे हैं आप यह कर रहे है, आप वह कर रहे हैं, जो आप नहीं कर रहे, तब यह दुष्टअहं प्रवेश कर जाता है और आप इसे कार्यान्वित करने लगते हैं और इसका प्रक्षेपण सभी दिशाओं में होने लगता है। इसका प्रक्षेपण जब सामने की ओर होता है तो यह दूसरों को नियंत्रित करता है, दूसरों पर प्रभुत्व जमाने का प्रयत्न करता है, उनका वध करने का प्रयत्न करता है, अहं जब दाएं और को जाता है तब यह अति चेतन बन जाता है। तब यह अटपटी मूर्खता पूर्ण और मिथ्या चीजों को देखने लगता है जब यह बाईं और को जाता है तो यह बोलने लगता है। कहने का अभिप्राय है कि स्वयं यह अति महत्त्वपूर्ण व्यक्ति, गुरु, ईश्वर के रूप में देखने लगता है और सोचता है कि मैं महान व्यक्ति हूं। यह बाई और की समस्या है, जब यह पीछे की ओर जाता है तब बहुत खतरनाक हो जाता है। ऐसी स्थिति में लोग ऐसे गुरु बन बैठते हैं और जिनके अंदर अनगिनत दोष होते हैं, फिर भी वह लोगों को ऐसी निकृष्टतम स्थिति में ले जाने का प्रयत्न करते हैं जिसे पूर्ण नर्क कहा गया है।"
परमपूज्य श्रीमाताजी निर्मलादेवी
साभार- प्रवचन 27.02.1987 मुंबई, निर्मल सुरभि ।