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ध्यान की व्यापकता व गहनता को आत्मसात करने का योग - सहजयोग (कैसे व कब करें ध्यान)

सहजयोग

ध्यान की व्यापकता व गहनता को आत्मसात करने का योग - सहजयोग (कैसे व कब करें ध्यान)

मालवा हेराल्ड | मेडिटेशन, योगा, इनरपीस आदि अनेक शब्द वर्तमान में सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों से हमें सुनने को मिलते हैं। अनेक लोग मेडिटेशन व योगा को व्यवसाय बनाकर लोगों को भ्रमित करने का कार्य भी कर रहे हैं। वर्तमान में ध्यान व योग जैसे गहन विषय के प्रति यह छिछलापन दु:खद है परंतु इसका सु:खद पहलू यह है कि लोग जिज्ञासु हैं।
भारतवर्ष अनादि काल से योगभूमि के रूप में धर्म व अध्यात्म में विश्व का मार्गदर्शक रहा है। यहां लगभग प्रत्येक व्यक्ति ध्यान, योग, तप आदि शब्दों से परिचित होता है। परंतु वास्तव में अधिकांश व्यक्ति इस ज्ञान को केवल शाब्दिक व सतही स्तर पर ही समझ पाते हैं जो कि भ्रामक होता है। वर्तमान समय में श्री आदिशक्ति का मानवीय अवतरण 'श्री माताजी निर्मला देवी जी' के रूप में होना मानव जाति को भ्रम की स्थिति से बाहर लाने का ईश्वरीय आशीर्वाद है।
श्री माताजी निर्मला देवी जी ने योग व ध्यान के गहन व सूक्ष्म रूप से सर्वसाधारण को परिचित कराने हेतु सहजयोग की स्थापना की। सहजयोग कोई नया धर्म अथवा संस्था नहीं है वरन् स्वयं को जानने व परमात्मा से एकाकार होने की एक प्रक्रिया है। श्री माताजी से पूर्व भी अनेकानेक ऋषियों, संतो व सद्गुरुओं ने सहजयोग की व्याख्या की, परंतु वह सर्वसाधारण तक नहीं पहुंच सकी व कुंडलिनी, चक्र, नाड़ियां आदि सामान्य जनमानस के लिए सिर्फ रहस्यमयी शब्द बनकर ही रह गए। श्री माताजी ने कुंडलिनी जागरण को सभी के लिए सहज बनाकर परमात्मा से एकाकारिता का एक अनूठा मार्ग 'सहजयोग' मानवजाति को प्रदान किया है।
श्री माताजी ने सहज योग का स्पष्टीकरण अपनी अमृतवाणी में इस प्रकार किया है कि, "सहजयोग - यह परम तत्व का अपना एक तरीका है, यह एक मार्ग है मानव जाति को उत्क्रांति के उस आयाम तक पहुंचाने का एक तरीका है, एक व्यवस्था है, जिससे मानव उच्च चेतना से परिचित हो जाए, उस चेतना को आत्मसात कर ले जिसके सहारे यह सारा संसार, सारी सृष्टि और मानव का हृदय चल रहा है।

पूरी सतर्कता से स्वयं ही अपने आप होने वाला मानव जीवन का विकास - यही सहजयोग है।" (गुरु पूर्णिमा ०१/०६/१९७२)

आत्म साक्षात्कार प्राप्ति के पश्चात, कुंडलिनी जागरण के पश्चात तथा चैतन्य लहरियों के अनुभव के पश्चात नियमित ध्यान आवश्यक है। परंतु ध्यान कैसे होना चाहिए इसका वर्णन भी श्री माताजी ने अपनी अमृतवाणी में किया है -
"सवेरे उठकर के सहजयोगी को चाहिए कि वो ध्यान करें, ये आदत लगाने की बात है, सवेरे के टाइम में एक तरह से ग्रहण करने की क्षमता ज्यादा होती है मनुष्य में।
सवेरे उठकर के ध्यान कैसे करें ?
पहले नतमस्तक होके अपने को अपने हृदय में नत करें, पहली चीज है नत करना, "Humble down yourself," किसी ने ये सोच लिया कि मैंने बहुत पा लिया या मैं बहुत बड़ा संत महात्मा हूँ तो समझ लीजिये वो गया, सहजयोग से गया, अत्यंत नम्रतापूर्वक अपने हृदय की ओर ध्यान करके नतमस्तक होके फोटो के सामने दोनों हाथ करके शांतिपूर्वक आज्ञा लेकर बैठें, बात बात में क्षमा मांगनी पड़ती है, सो उस वक्त भी क्षमा मांग करके कि हमसे अगर कोई गलती हो, उसे माफी करके ध्यान में आज हमें उतारिये, इस तरह की प्रार्थना करके जिन्होंने हमसे वैर किया है, सबको माफ कर देते हैं और हमने किसी से वैर किया है तो तुम हमें माफ कर दो, अत्यंत पवित्र भावना मन में ला करके और आप ध्यान में जाऐं और आंख बंद करके थोड़ी देर ध्यान करें।"

(मुंबई, २९ मई १९७६)
नियमित ध्यान से हमारे भीतर परमात्मा के प्रति, श्री माताजी के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव विकसित होता है तथा पूर्ण समर्पण ही आगे उन्नत होने का एकमेव उपाय होता है।
आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने हेतु टोल फ्री नंबर18002700800 पर कॉल करके अथवा वेबसाइट www.sahajayoga.org.in से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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