सहजयोग ध्यान सिद्ध करने हेतु उचित समय है नवरात्रि
महालक्ष्मी , महाकाली एवं महा सरस्वती के रुप में आदिशक्ति की त्रिगुणात्मक शक्तियों का स्थापन हमारे भीतर ही है

" सहस्रार वास्तव में छः चक्रों का समूह है , और यह एक खाली स्थान है , जिसके दोनों तरफ एक हज़ार नाड़ियाँ होती हैं और जब प्रकाश तालूक्षेत्र ( लिम्बिक एरिया ) में आता है तब ये नाड़ियाँ ज्योतिर्मय होती हैं और वे लौ ( ज्वाला ) के समान कोमल दिखायी देती है , बहुत ही सौम्य लौ के समान दिखाई देती हैं और इन सबकी लौ में वो सभी सात रंग होते हैं जो इन्द्रधनुष में दिखायी देते हैं । परन्तु अन्तिम लौ समग्र लौ बन जाती है । यह बिल्कुल स्वच्छ ( crystal clear ) लौ होती है । अतः ये सब सात तरह के प्रकाश अन्त में एक स्वच्छ प्रकाश बन जाते हैं। .....कुण्डलिनी तालूक्षेत्र में प्रवेश कर मस्तिष्क को प्रकाशित करती है । इस प्रकार मस्तिष्क ज्योतिर्मय होने के पश्चात , सहस्रार लौ के एक बण्डल के समान दिखायी देता है । यह बड़ा गहन विषय है । कुण्डलिनी द्वारा मस्तिष्क प्रदीप्त कर देने पर आपके मस्तिष्क में सत्य की अनुभूति होती है , इसीलिये सहस्रार ' सत्यखण्ड ' कहलाता है , यानी आप ' सत्य ' को , जो आपके मस्तिष्क द्वारा ग्रहण होता है , देखना शुरू कर देते हैं क्योंकि इससे पहले जो कुछ भी आप अपने मस्तिष्क द्वारा देखते हैं , सत्य नहीं होता । जो आप देखते हैं सिर्फ बाह्य रूप ही है । आत्मा के प्रकाश से प्रकाशित हुए बिना मानव मस्तिष्क दिव्यता को नहीं पहचान सकता।
...... समग्रीकरण से आपको वह शक्ति मिलती है जिससे आप जैसा समझते हैं तद्नुसार कार्य करते हैं , और जैसा आप समझते हैं उससे आप प्रसन्न रहते हैं । तो आप ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं जहाँ आप इस 'निरानन्द' को पाते हैं और यह निरानन्द आपको मिलता है । तब आप पूर्णतया आत्मस्वरूप बन जाते हैं ।" (प पू श्री माताजी, दिल्ली, 4/2/1983)