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सहजयोग से बने रत्नपारखी

गुणातीत बनाता है सहजयोग

��सहजयोग  से बने रत्नपारखी

मालवा हेराल्ड | ‘सहजयोग’ प्रणिता प. पू. माताजी श्री निर्मलादेवी कहते हैं , तीन गुण मनुष्य के अन्दर हैं। “इच्छाशक्ती” से हमारे अंदर जो गुण आते हैं , वो हैं “तमोगुण”। जो ‘क्रियाशक्ती ‘ से आते हैं , वो हैं “रजोगुण’।और हमारी धर्म की शक्ती से जो गुण हमारे अन्दर उत्पन्न होते हैं , वो हैं ‘सत्वगुण'। इन तीनों गुणों के हेरफेर अर्थात समन्वयन से ही (जिसे अंग्रेजी में Permutations and Combinations कहते हैं) अलग अलग प्रवृत्ति के मनुष्य बनते हैं।
संसार में तीन तरह के लोग होते हैं।
तामसिक - जो झूठ को ही सत्य मानकर उसके पीछे अपनी जिंदगी बर्बाद करते हैं।
राजसिक - जो झूठ और सत्य का फर्क नहीं जानते, उनको किसी चीज़ में गलती ही नजर नहीं आती।
सात्विक - जो सत्य को पहचान कर चलते हैं।
श्री माताजी कहतीं हैं , जब आप योगीजन होते हैं , तो सिवाय सत्य के आप कोई चीज़ को पकड़ ही नहीं सकते। जैसे रत्नपारखी लोग होते हैं , जो सच्चे रत्न को भलीभाँति परख लेते हैं , उसी प्रकार , योगीजन सत्य को एकदम पकड़ लेते हैं। आइए हम इन तीनो गुणों के बारे में थोड़ा सा अधिक जान ले।
‘तमोगुणी भाव कौनसा हैं?’ इसका उत्तर देते हुए श्रीमाताजी कहतीं हैं , अज्ञान , अधर्म , कुसंस्कार , हीनमन्यता (inferiority complex) ,आत्मदया (self pity ), भय , शोक , ग्लानि , जड़ता , आलस्य , कर्मकांड , आदि सब तमोगुणी भाव हैं। “तम” याने अँधेरा। ऐसा व्यक्ति अँधेरे से भयभीत होगा।
ऐसे व्यक्ति में हमेशा अपने और दूसरों के बारे में न्यूनगंड(wrong perceptions) होता है। अपने आप को दोषी मानना या भूतकाल के विचार के दुखी होना ये उनका स्वाभाविक स्वभाव होता है।वह अपनी इस स्वभाव से, अपने आप को हानि पहुँचा सकते है। आप अगर ‘तमोगुणी’ हैं, तो आप एकदम निष्क्रिय और सुस्त हो जाते हैं। अपने अंदर के शक्ति का सही रूप से क्षय न होने के कारण आप डिप्रेशन तथा अन्य मानसिक , शारीरिक बीमारियों का शिकार हो सकते हैं।

“रजोगुणी” व्यक्ति में काम , क्रोध , द्वेष , मोह , मद , मत्सर(jealousy) , गर्व , अहंकार आदि स्वभाव होते हैं। “आक्रामक प्रवृत्ति” रजोगुण है। ऐसे व्यक्ति अपने आप को ‘महान’ समझते’ हैं।खुद के अहंकार में रहना, अतिकर्मी होना, सदैव दूसरों पर अपना अधिकार जमाना, अपने इस स्वभाव के कारण , ऐसा व्यक्ति दूसरों को और अप्रत्यक्ष तरीके से अपने आपको हानि पहुंचाता है।आप यदि रजोगुणी हैं , तो आप अति गतिशील हो जाते हैं , जिसके कारण आपकी शक्ति अधिक मात्रा में क्षय होती है, और आपको थकान महसूस होती है।आप के अंदर गर्मी बढ़कर, ब्लड प्रेशर,हृदयरोग,अस्थमा, diabetics जैसी कई बीमारियों का शिकार हो सकते हैं।
सत्य, ज्ञान, वैराग्य , श्रद्धा, प्रेम, संतोष आदि “सत्वगुणी “ भाव हैं। ऐसे लोग धर्मपरायण होते हैं ,परंतु इनके मन में अधर्मी लोगों के प्रति एक प्रकार की तिरस्कार की भावना होती है। उनका स्वभाव उन्हें अकेलेपन की ओर धकेलता है। ऐसे व्यक्ति शुष्क या भावनाहीन हो सकते हैं। संसार के प्रति उनमें तटस्थता आ सकती है। ऐसे लोग अपनी सांसारिक जिम्मेदारी को छोड़कर वैराग्य का मार्ग अपना सकते हैं। लेकिन इस प्रकार के लोग भी व्यर्थ हैं।
श्री माताजी कहते हैं - “आप को गुणातीत होना है (यानी इन गुणों के परे जाना है )”। वे कहती हैं की आप को अपने जिम्मेदारियों के साथ रहकर तटस्थ मार्ग से एक सुस्थिर व्यक्ति बनकर ही गुणातीत होना है |
लेकिन ये कैसे घटित होगा ? क्या अपने सांसारिक जीवन में रहकर ही हम आध्यात्मिक हो सकते हैं ?

श्री माताजी द्वारा संचालित “सहजयोग” एक ऐसी ध्यान विधि है , एक ऐसी जीवन पद्धति है जो हमें हर क्षण आत्मपरीक्षण कर सही मार्ग पर चलना सिखाती है।जो आपको एक संतुलित व्यक्तित्व प्रदान करती है।
सहज योग ध्यान के नियमित अभ्यास से आप अपने सांसारिक जीवन में रहकर अत्यंत धार्मिक, शुद्ध , निर्मल और आनंदमय जिंदगी बिता सकते हैं। आइए, एक रत्नपारखी की तरह सत्य और सात्विक मार्ग से अपने अंदर के इन गुणरत्नों को परख कर और पिरो कर अपने गले का हार बनाये और गुणातीत हो जाये |

इसे जानने और अनुभव करने के लिए सहज योग से जुड़े - learning sahajayoga यूट्यूब चैनल पर प्रति शनिवार शाम 6:30 बजे घर बैठकर सहज योग ध्यान सीख सकते हैं |

नजदीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी के लिए फ्री नंबर 18002700800 या वेबसाइट www.sahajayoga.org.in से प्राप्त करे |

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