श्री गणेश जैसी पूर्ण अबोधिता और पवित्रता ही ईश्वरीय चैतन्य को आकर्षित करती है
सहज योग

मालवा हेराल्ड | आदिशक्ति ने सबसे पहले श्री गणेश का सृजन किया। उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्योंकि चैतन्य, पावित्र्य और मंगलमयता से वे सारे वातावरण को भरना चाहती थी। यह गुण अब भी है, सर्वत्र है, चैतन्य अब भी कार्यरत है, परन्तु यह आधुनिक मस्तिष्क में प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि आधुनिक मस्तिष्क अबोधिता से अनभिज्ञ है। अबोधिता का इसे बिल्कुल ज्ञान नहीं। अबोधिता से ही जीवन में नैतिकता आती है। नैतिकता अबोधिता की अभिव्यक्ति है। अबोधिता से पता चलता है कि व्यक्ति दुश्चरित्र नहीं हो सकता।"
परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी ने श्री गणेश जी की सृजनात्मक व्याखा अपनी अमृतवाणी करते हुए कहा है कि,श्री गणेश का सबसे बड़ा आशिर्वाद है अबोधिता. यही गुण हमें चैतन्य का बोध देती है. वही चैतन्य जो सारे संसार को चला रही है. चैतन्य की सार्थकता यदि अविश्वसनीय लगती है तो उसका कारण है हम ध्यान से अपने आसपास के परिवेश को देखकर उसे आत्मसात नहीं करते. पेड़ पौधे, धरती, आकाश, समुद्र हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि वे प्रकृति और ईश्वरीय चैतन्य से चलायमान हैl हम ईश्वर प्रदत्त प्राकृतिक चीजों से कई चीजें बना लेते हैं.. पर किसी प्रकृति प्रदत्त चीजों का निर्माण नहीं कर सकते हैं. यदि हमें किसी को खून देना है तो दूसरे इंसान के शरीर से निकालना पडता है..एक व्यक्ति को आंख लगाना हो तो दूसरे व्यक्ति को देना पडता है क्योंकि ईश्वरीय सृजन इंसान के लिए संभव नहीं. जब बात ईश्वरीय चैतन्य की होती है, तब उस अनुभूति को पाने का माध्यम है सहज योग | इसके लिए पूर्ण अबोधिता आवश्यक है, जो श्री गणेश का सबसे बड़ा आशिर्वाद है. अबोधिता के बगैर चैतन्य को महसूस नहीं किया जा सकता.. चैतन्य से बढ़कर कोई और निधि नहीं अत: श्री गणेश से अबोधिता का आशीर्वाद लेने हेतु कदम उठाये |
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