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ध्यान में निर्विचारिता स्थापित होने के पश्चात् परमानन्द की प्राप्ति सहज है

प्रकृति का सानिध्य ही निर्विचारिता व वास्तविक आनंद का आधार है

ध्यान में निर्विचारिता स्थापित होने के पश्चात् परमानन्द की प्राप्ति सहज है

मालवा हेराल्ड |आधुनिक जीवन शैली ने बच्चों से लेकर वयस्कों व वृद्धों तक को अत्यंत ही व्यस्त कर दिया है। जिनके पास कुछ समय होता भी है तो मोबाइल रुपी व्यस्तता उन्हें घेरे रहती है। ऐसे में मानव मस्तिष्क प्रतिपल चेतन अचेतन अवस्था में क्रियाशील रहने लगा है। प्रतिक्षण किसी न किसी विचार में हम खोए रहते हैं। निर्विचारिता क्या होती है, हममें से कई इस बात से अनभिज्ञ ही होंगे। अनेक मानसिक रोग इसी स्थिति का परिणाम हैं। सहजयोग ध्यान मानसिक संतुलन को स्थापित करने हेतु एक प्रमाणिक, वैज्ञानिक व प्रभावी पद्धति है।
सहजयोग संस्थापिका परम पूज्य श्री माता जी निर्मला देवी जी कुंडलिनी जागरण के बारे में बताती हैं कि,
" जब आप किसी भी सुन्दर दृश्य को देखेंगे, परमात्मा की रचना की ओर दृष्टि करेंगे, आप निर्विचार हो जाएगे, निर्विचार होते ही उसके अंदर की जो आनंद शक्ति है l वो आपके अंदर पूरी प्रतिबिम्बित होगी l इतना ही नहीं, आप उससे पूरी तरह से तादात्म्य पा लेंगे, बहुत लोगों ने ये भी पूछा है कि हमें अब आगे क्या करना होगा, अब क्या करना होगा सिर्फ देखना होगा ।
जैसे गणेश जी हैं उनके मूषक वाहन है, अब आपका वाहन सिर्फ आपका चित्त है, आप चित्तारूढ हैं, क्या कमाल है, चित्त पे अपने बैठे हुए हैं, जहाँ चित्त जाये वहीँ काम हो जाये, जिसको भी देखा, वो सता रहा है, परेशान कर रहा है, किसी भी आदमी, जिसके लिए भी आप सोचते हैं, अपने सहस्रार पे उसको लाकर उसको खींचीये, बीच में ब्रह्मरंध्र है, आपको आश्चर्य होगा कि उसकी काफी हालत ठीक हो जायेगी, बैठे बैठे यहाँ से प्यार का चक्कर घुमाने से आदमी ठीक हो जाता है क्योंकि नफरत से ज्यादा शक्तिशाली प्यार है, बहुत शक्तिशाली है। पाने के बाद कुछ नहीं करना है सिर्फ देखना है।"
( 25 नवम्बर 1973 मुंबई में दिए प्रवचन से साभार।)
निर्विचारिता की इस अवस्था को पाने व अपने चित्त को आनंद में स्थापित करने हेतु आप हमारे टोल फ्री नंबर 18002700800 पर कॉल कर सकते हैं या वेबसाइट www.sahajayoga.org.in पर देख सकते हैं।

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