आत्मचेतना का विकास व्यक्ति की प्रार्थनाओं को विस्तृत बनाता है। - परम पूज्य श्री माताजी
निरानन्द की प्राप्ति ही प्रार्थनाओं की स्वीकारोक्ति है

मालवा हेराल्ड |ध्यान हमें वैराग्य सिखाता है, छोड़ना सिखाता है, देना सिखाता है, लौटाना सिखाता है । अधिकांशतः मनुष्य की प्रार्थनाएं केवल लौकिक प्राप्ति के लिए होती हैं, कभी अपने लिए, कभी अपनों के लिए। लौकिक जीवन में कुछ ना कुछ उसे चाहिए ही होता है और जब वह परम शक्तिमान के सामने उपस्थित होता है तो वही सब जो उसके दिमाग में चल रहा है जिसे वह आवश्यक समझता है वही एक के बाद एक उसकी प्रार्थनाओं का हिस्सा होता चला जाता है। जबकि वास्तव में परमात्मा को जानने के बाद, ध्यान में ईश्वर तत्व का एवं अपनी आत्मा में परम तत्व का अनुभव कर लेने के बाद मनुष्य परिपक्व मति हो जाता है। अब वह जान जाता है कि लौकिक जीवन की अनंत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यह प्रार्थना का अनमोल समय उसे खोना नहीं है।
वास्तव में परमात्मा से परम मांगना चाहिए अलौकिक मांगना चाहिए, परंतु ध्यान के पूर्व दृष्टि के संकोच के कारण वह बड़ा नहीं सोच पाता है।कूप मंडूक की तरह लौकिक जीवन की समस्याओं को ही प्रार्थना में बदलता रहता है यह सच्ची प्रार्थना नहीं होती । सहज योग में अत्यंत सरलता से ध्यान के द्वारा आत्मा से साक्षात्कार का अनुभव होता है और हम अपने भीतर गहनता का अनुभव करते हैं यही गहनता हमारी मन बुद्धि को परिपक्व करती है गहरा करती है तब हम प्रार्थना में निर्विचार हो जाते हैं और हमारी ऐसी प्रार्थनाएं फलीभूत भी होती हैं l
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